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________________ ७०३ गा० १२३ ] चारित्रमोह-उपशामक-विशेषक्रिया-निरूपण हीणं । [ २५६. तदो जहण्णफयादिवग्गणाए अणंतगणहीणं, तत्तो विसेसहीणं । ] २५७. जहा विदियसमए तहा सेसेसु समए सु । २५८ तिव्य मंददाए जहणिया किट्टी थोवा । विदियकिट्टी अणंतगणा । तदिया किट्टी अणंतगुणा । एवमणंतगुणाए सेडीए गच्छदि जाव चरिमकिट्टि ति । २५९. एमो विदिय-तिभागो किट्टीकरणद्धा णाम । २६०. किट्टीकरणद्धासंखेज्जेसु भागेसु गदेसु लोभसंजलणस्स अंतोमुहुत्तहिदिगो बंधो । २६१. तिण्हं घादिकम्माणं ठिदिबंधा दिवसपुधत्तं । २६२. जाव किट्टीकरणद्धाए दुचरिमो ठिदिबंधो ताधे णामागोद-वेदणीयाणं संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि ठिदिबंधो । २६३. किट्टीकरणद्धाए चरियो ठिदिबंधो लोहसंजलणस्स अंतोमुहुत्तिओ । २६४. णाणावरण-दंसणावरण-अंतरायाणमहोरत्तस्संतो । २६५. णामा-गोद-वेदणीयाणं वेण्हं वस्साणमंतो । २६६. तिस्से किट्टीकरणद्धाएं तिसु आवलियासु समयूणासु सेसासु दुविहो लोहो लोहसंजलणे ण संकामिजदि, सत्थागो चेव उवसामिज्जदि । २६७ किट्टीकरणद्धाए आवलिय-पडिआवलियाए सेसाए आगाल-पडिआगालो वोच्छिण्णो । २६८. पडि आवलियाए एक्कम्हि समए ऐसे लोहसंजलणस्स जहण्णिया द्विदि-उदीरणा । २६९. ताधे चेव जाओ दो आवलियाओ समयूणाओ एत्तियवर्गणामें अनन्तगुणित हीन देता है, तत्पश्चात् विशेष हीन देता है । ] जैसा क्रम द्वितीय समयमें है, वैसा ही क्रम शेप समयोमें भी जानना चाहिए ॥२५०-२५७॥ चूर्णिमू०-अब कृष्टियोकी तीव्रता-मन्दतासम्बन्धी अल्पबहुत्व कहते हैं-जघन्य कृष्टि स्तोक है। द्वितीय कृष्टि अनन्तगुणी है। तृतीय कृष्टि अनन्तगुणी है। इस प्रकार अन्तिम कृष्टि तक अनन्तगुणित श्रेणीका यह क्रम चला जाता है । इस, द्वितीय विभागका नाम कृष्टिकरणकाल है। कृष्टिकरणकालके संख्यात भागोके बीत जानेपर संज्वलनलोभका स्थितिवन्ध अन्तर्मुहूर्त-प्रमाण होता है। तीन घातिया कर्मोंका स्थितिबन्ध दिवसपृथक्त्वप्रमाण होता है । कृष्टिकरणकालके द्विचरम स्थितिवन्ध तक नाम, गोत्र और वेदनीय कर्मका स्थितिबन्ध संख्यात सहस्र वर्ष होता है। कृष्टिकरणकालके अन्तिम समयमे संज्वलनलोभका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तमात्र होता है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायका स्थितिबन्ध कुछ कम अहो-रात्रप्रमाण होता है। नाम, गोत्र और वेदनीयका स्थितिबन्ध कुछ कम दो वर्प-प्रमाण होता है। उस कृष्टिकरणके कालम एक समय कम तीन आवलियोंके शेष रहने पर दोनो मध्यम लोभ, संज्वलनलोभमे संक्रमण नही करते हैं, किन्तु स्वस्थानमें ही उपशमको प्राप्त होगे ॥२५८-२६६॥ चूर्णिसू०-कृष्टिकरणकालमे आवली और प्रत्यावलीके शेष रहने पर आगाल और प्रत्यागाल व्युच्छिन्न हो जाते है । प्रत्यावलीमें एक समय शेष रहने पर संज्वलनलोभकी जघन्य स्थिति-उदीरणा होती है। उसी समयमे जो एक समय कम दो आवलियाँ
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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