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________________ प्रस्तावना ५६ अर्थात् यतिवृषभाचार्यके वचनानुसार यदि सासादनगुणस्थानवर्ती मरता है, तो नियमसे देव होता है । ० यतिवृषभने कसायपाहुडकी चूर्णिमें अपने इस मतको इस प्रकार से व्यक्त किया है आसाणं पु गदो जदि मरदि, ण सको गिरयगदि तिरिक्खगदिं मंगुसगदिं वागंतु । शियमा देवरादिं गच्छदि । ( कसा० अधि० १४, सू० ५४४ ) इस सूत्र का अर्थ स्पष्ट है । इन उल्लेखोंसे स्पष्ट रूपसे यह सिद्ध है कि आ० यतिंवृपभ ० पूज्यपाद से पहले हुए हैं । यतः पूज्यपाद के शिष्य वज्रनन्दिने वि० सं०५२६ मे द्रविड़ संघकी स्थापना की है और यतिवृषभके मतका पूज्यपादने उल्लेख किया है, अतः उनका वि० सं० ५२६ के पूर्व होना निश्चित है । इससे यह स्पष्ट फलित होता है कि यतिवृषभका समय विक्रमकी छठी शताब्दिका प्रथम चरण है । 7 कसा पाहुडका अन्य ग्रन्थकारों पर प्रभाव कसायपाहुडकी रचनाके पश्चात् रचे गये -ग्रन्थोंका आलोड़न करनेसे ज्ञात होता है कि वह अपने विपयका इतना सुसम्बद्ध, गहन होते हुये भी सुगम एवं अनुपम ग्रन्थ है कि परवर्ती ग्रन्थकारोंने उसके कई विषयों का स्पर्श भी नहीं किया है । हा, गाथा - सूत्रों से सूचित बन्धका भूतबलि ने अपने महाबन्धमें बन्ध-संक्रमण और उदय - उदीरणाका शिवशर्नने अपनी कम्मपयडीमें और सम्यक्त्व, देशसयम-सयमलब्धि तथा क्षपणाका नेमिचन्द्रने क्रमशः अपने लब्धिसार-क्षपणासार ग्रन्थ मे अवश्य ही विभाषात्मक विवेचन किया है । किन्तु उसके प्रेयोद्वेषविभक्ति, उपयोग, चतुःस्थान और व्यजन नामक अधिकारोंपर किसी परवर्ती ग्रन्थकारने कुछ अधिक प्रकाश डालकर विवेचन किया हो, यह हमारे देखने में नहीं आया । इसका कारण यही प्रतीत होता है कि गुणधराचार्य के पश्चात् पेज्जदोसपाहुड-विषयक उक्त अधिकारोंका ज्ञान अधिकाशमें विलुप्त ही हो गया । जो कुछ भी तद्विषयक थोड़ा-बहुत ज्ञान अवशिष्ट रहा था, उसे पीछे होने वाले आचार्योंने कसायपाहुडका टीकाकार बन करके अपनी-अपनी रचनाओं में निबद्ध कर दिया । यही कारण है कि इस ग्रन्थ पर विभिन्न आचार्योंने चूर्णि उच्चारणावृत्ति, पद्धति, चूडामणि और जयधवला नामसे प्रसिद्ध अनेक भाष्य और टीका- ग्रन्थ रचे, जिनका कि प्रमाण दो लाख श्लोकों के लगभग है । कसायपाहुडके जिन विषयों पर परवर्ती ग्रन्थकारोने अपनी रचनाओं में कुछ अधिक प्रकाश डाला है, उनमें भी इसकी अनेक गाथाएं ज्यों की त्यों या साधारण से पाठ भेदके साथ पाई जाती है, जिनकी सख्या कम्मपयडीमें १७ और लब्धिसार- क्षपणासार में १५ है । जिनका विवरण इस प्रकार है - कसायपाहुडकी गाथाङ्क २७ से लेकर ३६ तककी १३गाथाएँ तथा १०४,१०७, १०८, १०६ ये चार गाथाऍ कम्मपयडीमे गाथा ११२ से लेकर १२४ तक, तथा ३३३ से लेकर ३३६ तक क्रमशः पाई जाती है । इसी प्रकार कसा पाहुडकी ६७, ६८, १०३, १०८, ११०, १३८, १३६, १४३, १४४, १४६, १४८, १५२, १५३, १५४ और १५६ नम्बर वाली १५ गाथाएँ क्रमशः लब्धिसार-क्षपणासारमें ६६, १०१, १०२, १०६, ११०, ४३५, ४३६, ४५०, ४३८, ४५१, ४५२, ३६८, ३६६, ४०० और ४०१ नम्बर पर पाई जाती हैं। श्र० नेमिचन्द्र ने अपने लब्धिसार-क्षपणासारमें कसायपाहुडकी उक्त गाथाओं को ज्योंका त्यों अपनानेके अतिरिक्त अनेक गाथाओं का आशय लेकर भी अनेक गाथाएँ रची हैं।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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