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________________ कसायपाहुडसुत्त संघ' रखा जानेसे इतना तो सुनिश्चित है कि वे अर्हद्वलिसे पहले हो चुके हैं । यतः अहंदुबलिका समय प्राकृत पट्टावलीके अनुसार वी० नि० ५६५ या वि० सं० ६५ सिद्ध है, अतः गुणधराचार्यका समय उनसे पूर्व सिद्ध होता है । गुणधरकी परम्पराको ख्याति प्राप्त करने में लगभग सौ वर्ष लगना स्वाभाविक है, अतएव पट्खडागमकार श्री धरसेनाचार्यसे कसायपाहुडके प्रणेता श्री गुणधराचार्य लगभग दो सौ वर्ष पूर्ववर्ती सिद्ध होते है और इस प्रकार उनका समय विक्रमपूर्व एक शताव्दी सिद्ध होता है । आ० यतिवृषभने अपनी तिलोयपरणत्तिमें भ० महावीरके निर्वाणसे लेकर एक हजार वर्ष तक होनेवाले राजाओंके कालका उल्लेख किया है, अतः उसके पूर्व तो उनका होना सम्भव वहीं है । और यत. विशेपावश्यकभाष्यकार श्वेताम्बराचार्य श्री जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणने अपने विशेषावश्यकभाष्यमें चूर्णिकार यतिवृपभके आदेशकपाय-विपयक मतका उल्लेख किया है और विशेपॉवश्यकभाष्यकी रचनाके शक सं० ५३१ (वि० सं० ६६६) में होनेका उल्लेख मिलता है, अतः वे वि० स० ६६६ के बादके भी विद्वान् नहीं हो सकते । ... आ० यतिवृषभ पूज्यपादसे पूर्व में हुए है । इसका कारण यह है कि उन्होंने अपनी सर्वार्थसिद्धिमें उनके एक मत-विशेषका उल्लेख किया है 'अथवा येषां मते सासादन एकेन्द्रियेषु नोत्पद्यते तन्मतापेक्षया द्वादश भागा न दत्ता। अर्थात् जिन प्राचार्योंके मतसे सासादन गुणस्थानवी जीव एकेन्द्रियों में उत्पन्न नहीं होता है, उनके मतकी अपेक्षा बारह बटे चौदह भाग स्पर्शन-क्षेत्र नहीं कहा गया है। . यहां यह बात ज्ञातव्य है कि सासादनगुणस्थानवाला यदि मरे तो नियमसे देवोंमें उत्पन्न होता है, यह आ० यतिवृपभका ही मत है ऐसा लब्धिसार-क्षपणासारके कर्ता आ० नेमिचन्द्रने स्पष्ट शब्दोंमे कहा है. जदि मरदि सासणो सो णिरय-तिरिक्खं णरं ण गच्छेदि । णियमा देवं गच्छदि जइवसहमुणिंदवयणेणं ॥ ३४६ ॥ आदेसकसाए। जहा चित्तकम्मे लिहिदो कोहो रूसिदो तिवलिदणिडालो भिउडि काऊण' यह कसायपाहुडके पेज्जदोसविहत्ती नामक प्रथम अधिकारका ५९ वा सूत्र है। इसका अर्थ है कि क्रोधके कारण जिसकी भकुटि चढी हुई है और ललाटपर तीन वली पड़ी हुई हैं, ऐसे क्रोधी मनुप्यको चित्रमें लिखित आकार प्रादेशकपाय है। किन्तु विगेपावश्यकभाष्यकार कहते हैं कि अन्तरगम कपायका उदय नही होने पर भी नाटक आदि में केवल अभिनयके लिए जो कृत्रिम फ्रोध प्रकट करते हुए क्रोधी पुरुषका स्वाग धारण किया जाता है, वह आदेशकपाय है। इस प्रकारसे प्रादेशकपायका स्वरूप वतला करके भाष्यकार कसायपाहुचरिणमें निर्दिष्ट स्वरुपका 'केइ' कह करके इस प्रकारसे उल्लेख करते है आएसओ कसाश्रो कइयवकयभिउडिभंगुराकारो। केई चित्ताइगो ठवणाणत्यंतरो सोऽय ।।२६८१|| अर्थात् कितने ही प्राचार्य क्रोधीके चित्रादिगत प्राकारको प्रादेशकपाय महते हैं, परन्तु यह स्थापनाकपायसे भिन्न नही है, इसलिए नाटकादिके नकली शोधोके स्वागको ही श्रादेगापाय मानना चाहिए।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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