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________________ गा० १२३) चारित्रमोह-उपशामक-विशेषक्रिया-निरूपण परमद्विदीए तिणि आवलियाओ सेसाओ त्ति । २१४ तिसु आवलियासु समयूणासु सेसासु तत्तो पाए दुविहो कोहो कोहसंजलणे* ण संछुभदि ।। २१५ जाधे कोहसंजलणस्स परमहिदीए समयूणावलिया सेसा, ताधे चेव कोहसंजलणस्स बंधोदया वोच्छिण्णा । २१६. माणसंजलणस्स पढमसमयवेदगो पहमद्विदिकारओ च । २१७. पहमट्ठिदि करेमाणो उदये पदेसग्गं थोवं देदि, से काले असं खेज्जगुणं । एवमसंखेज्जगुणाए सेढीए जाव पडमद्विदिचरिमसमओ त्ति । २१८ विदियद्विदीए जा आदिद्विदी तिस्से असंखेज्जगुणहीणं तदो विसेसहीणं चेव । २१९. जाधे कोधस्स बंधोदया वोच्छिण्णा ताधे पाये माणस्स तिधिहस्स उवसामगो । २२०. ताधे संजलणाणं द्विदिवंधो चत्तारि मासा अंतीमुहुत्तेण ऊणया । सेसाणं कम्माणं हिदिवंधो संखेज्जाणि वस्स सहस्साणि । २२१. माणसंजलणस्स पढमट्टि दीए तिसु आवलियासु समयूणासु सेसासु दुविहो माणो माणसंजलणे ण संछुभदि । २२२. पडिआवलियाए सेसाए आगालआवलियोंके शेष रहने पर उस स्थल पर दो प्रकारके क्रोधको संज्वलनक्रोधमे संक्रान्त नहीं करता है । ( किन्तु संचलनमानमे संक्रान्त करता है।) ॥२००-२१४॥ चूर्णिसू०-जिस समय संज्वलनक्रोधकी प्रथमस्थितिमे केवल एक समय कम आवलीकाल शेष रहता है, उस समय संज्वलनक्रोधका बन्ध और उदय व्युच्छिन्न हो जाता है। उसी समय वह संज्वलनमानका प्रथम समयवेदक और प्रथमस्थितिका कारक भी होता है। प्रथमस्थितिको करता हुआ वह उदयमें अल्प प्रदेशाग्रको देता है और तदनन्तर कालमै असंख्यातगुणित प्रदेशाग्रको देता है। इस प्रकार असंख्यातगुणित श्रेणीके द्वारा प्रथमस्थितिके अन्तिम समय तक देता चला जाता है । द्वितीयस्थितिकी जो आदि स्थिति है उसमें असंख्यातगुणित हीन प्रदेशाग्रको देता है । तदनन्तर विशेष हीन प्रदेशाग्र को देता है । ( यह क्रम चरम स्थितिमें अतिस्थापनावली कालके अवशिष्ट रहने तक जारी रहता है । ) जिस स्थलपर संज्वलनक्रोधके बन्ध और उदय व्युच्छिन्न होते हैं, उस स्थलपर ही वह तीनो प्रकारके मानका उपशामक होता है, अर्थात् उनका उपशमन प्रारम्भ करता है। उस समय चारो सज्वलनोका स्थितिवन्ध अन्तर्मुहूर्त कम चार मास है। शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यात सहस्र वर्षप्रमाण है ॥२१५-२२०॥ चूर्णिसू०-संज्वलनमानकी प्रथमस्थितिमे एक समय कम तीन आवलियोंके शेष रहनेपर दो प्रकारके मानको संज्वलनमानमें संक्रान्त नहीं करता है । ( किन्तु संज्वलनमायाकषायमे संक्रान्त करता है । यहॉपर भी प्रत्यावलीके शेष रह जानेपर आगाल और प्रत्यागाल ताम्रपत्रगली प्रतिमे 'दुबिहो कोहो काहसजलणे' के स्थ नपर 'दुविह कोह (हो) संजलणे' ऐसा पाठ मुद्रित है । (देखो पृ० १.५३) ॐ ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'माणसंजलणे के स्थानपर केवल 'सजलणे' पाठ मुद्रित है । ( देखो पृ०१८५४)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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