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________________ गा० १२३ ] - चारित्रमोह-उपशामक-विशेषक्रिया-निरूपण १४१. छसु आवलियासु गदासु उदीरणा णाम किं भणिदं होइ ? १४२. विहासा । १४३. जहा णाम समयपबद्धो बद्धो आवलियादिकंतो सक्को उदीरेदुमेवमंतरादो क्रमके अनुसार द्रव्यके संक्रमण करनेको आनुपूर्वी-संक्रम कहते है। पुरुषवेदके उदयसे चढ़ा हुआ जीव स्त्रीवेद और नपुंसकवेदके प्रदेशाग्रको नियमसे पुरुपवेदमे संक्रान्त करता है। इसी प्रकार क्रोधकषायके उदयसे चढ़ा हुआ जीव पुरुषवेद, छह नोकषाय, प्रत्याख्यानावरण और अप्रत्याख्यानावरण क्रोधके प्रदेशाग्रको क्रोधसंज्वलनके ऊपर संक्रान्त करता है और कहीं नहीं । पुनः क्रोधसंज्वलन और दोनो मध्यम मानकषायके प्रदेशाग्रको नियमसे मानसंज्वलनमे संक्रान्त करता है, अन्यत्र कहीं नहीं। मानसंज्वलनको और द्विविध मध्यम मायाके प्रदेशाग्रको नियमसे मायासंज्वलनमे निक्षिप्त करता है । मायासंज्वलन और द्विविध मध्यम लोभके प्रदेशानको नियमसे लोभसंज्वलनमें संक्रान्त करता है । इस प्रकारके क्रमसे होनेवाले संक्रमणको आनुपूर्वी-संक्रमण कहते हैं। इस स्थलके पूर्व अनानुपूर्वीसे प्रवर्तमान चारित्रमोहनीयकी प्रकृतियोका संक्रमण इस समय इस उपर्युक्त प्रतिनियत आनुपूर्वीसे प्रवृत्त होता है, ऐसा यहाँ अभिप्राय जानना चाहिए (१)। 'लोभका असंक्रम' यह दूसरा करण है। सूत्रमें 'लोभ' ऐसा सामान्य निर्देश होनेपर भी यहाँ लोभसे संज्वलनलोभका ही ग्रहण करना चाहिए । लोभके असंक्रमणका अर्थ यह है कि इससे पूर्व अनानुपूर्वीसे लोभसंज्वलनका शेष संज्वलनकपायोमे और पुरुषवेदमें प्रवर्तमान संक्रमण इस समय बन्द हो जाता है (२) । 'मोहनीयका एकस्थानीय बन्ध' यह तीसरा करण है, इसका अर्थ यह है कि इससे पूर्व मोहनीयकर्मका अनुभाग देशघाती द्विस्थानीयरूपसे बॅधता था, वह इस समय परिणामोंकी विशुद्धि के योगसे हट कर एकस्थानीय हो जाता है (३)। 'नपुंसकवेदका प्रथम समय-उपशामक' यह चतुर्थ करण है । इसका अभिप्राय यह है कि तीनो वेदोमेसे नपुंसकवेदकी ही सर्वप्रथम इस स्थलपर आयुक्तकरणके द्वारा उपशामन-क्रियामें प्रवृत्ति होती है (४)। 'छह आवलियोके व्यतीत होनेपर उदीरणा' यह पंचम करण है । इसका अर्थ आगे चूर्णिकार स्वयं ही करेंगे (५)। 'मोहनीयका एकस्थानीय उदय' यह षष्ट करण है। इसका अर्थ यह है कि इससे पूर्व लता और दारुरूप द्विस्थानीय देशघातिस्वरूपसे प्रवर्तमान अनुभागका उदय अन्तरकरणके अनन्तर ही एकस्थानीय लतारूपसे परिणत हो जाता है (६) । 'मोहनीयका संख्यातवर्षीय स्थितिबन्ध' यह सप्तम करण है। इसका अर्थ यह है कि इससे पूर्व मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध असंख्यात वोका होता था। वह कषायोकी मन्दता या परिणामोकी विशुद्धिताके प्रभावसे एकदम घटकर संख्यात वर्षप्रमाण रह जाता है । किन्तु शेप कर्मोंकास्थितिवन्ध इस समय भी असंख्यात वर्षोंका ही होता है (७)। . शंका-छह आवलियोके व्यतीत होनेपर उदीरणा होती है, इसका क्या अभिप्राय है ? ।।१४१॥ समाधान-छह आवलीकालके व्यतीत होनेपर उदीरणा होती है, इसका अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार इससे पूर्व अधस्तन सर्वत्र संसारावस्थामे बँधा हुआ समयप्रबद्ध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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