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________________ ६८७ गा० १२३ ] चारित्रमोह-उपशामक-बन्ध अल्पवहुत्व-निरूपण खेज्जगुणो । ९९. डदरेसिं चदुण्हं पि कम्माणं तुल्लो असंखेज्जगुणो । १००. एदेण कमेण संखेज्जाणि ठिदिबंधसहस्साणि वहूणि गदाणि । १०१. तदो अण्णो द्विदिबंधो । १०२. एकसराहेण मोहणीयस्स हिदिबंधो थोवो । १०३. णामा-गोदाणं पि कम्माणं ठिदिवंधो तुल्लो असंखेज्जगुणो । १०४. णाणावरणीय-दसणावरणीय-अंतराइयाणं तिण्हं पि कम्माणं द्विदिबंधो तुल्लो असंखेज्जगुणो । १०५. वेदणीयस्स हिदिबंधो असंखेज्जगुणो। १०६. तिण्हं पि कम्माणं णथि वियप्पो संखेज्जगुणहीणो वा विसेसहीणो वा, एकसराहेण असंखेज्जगुणहीणो १०७ एदेण अप्पाबहुअविहिणा संखेज्जाणि द्विदिबंध-सहस्साणि बहूणि गदाणि । १०८. तदो अण्णो डिदिबंधो । १०९ एक्कसराहेण मोहणीयस्स हिदिवंधो थोवो । ११०. णाणावरणीय-दसणावरणीय-अंतराइयाणं तिहं पि कम्माणं द्विदिवंधो तुल्लो असंखेज्जगुणो । १११. णामा-गोदाणं हिदिबंधो असंखेज्जगुणो । ११२. वेदणीयस्स द्विदिबंधो विसेसाहिओ । ११३. एत्थ वि णत्थि वियप्पो, तिण्हं पि कम्माणं द्विदिवंधो णामा-गोदाणं द्विदिबंधादो हेडदो जायमाणो एकसराहेण असंखेज्जगुणहीणो नाम और गोत्रकर्मका स्थितिबन्ध असंख्यातगुणा होता है। इससे इतर ज्ञानावरणादि चारो ही कर्मोंका स्थितिबन्ध परस्पर तुल्य और असंख्यातगुणा होता है। इसी क्रमसे बहुतसे संख्यात-सहस्र स्थितिबन्ध व्यतीत होते है। तत्पश्चात् अन्य प्रकारका स्थितिबन्ध प्रारम्भ होता है। वह इस प्रकार है-एक शराघातसे मोहनीय कर्मका स्थितिबन्ध सबसे कम हो जाता है। इससे नाम और गोत्र कर्मका स्थितिबन्ध परस्पर तुल्य और असंख्यातगुणा होता है । इससे ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय, इन तीनों ही कर्मोंका स्थितिबन्ध परस्पर तुल्य और असंख्यातगुणा होता है। इससे वेदनीयकर्मका स्थितिबन्ध असंख्यातगुणा होता है । वेदनीय कर्मके स्थितिबन्धसे अपसरण करनेवाले ज्ञानावरणादि तीनों ही कर्मोंके स्थितिबन्धके संख्यातगुणा हीन या विशेष-हीन रूप कोई अन्य विकल्प नही है, किन्तु एक शराघातसे ही असंख्यातगुणा हीन हो जाता है। इस अल्पबहुत्वके क्रमसे अनेक संख्यात-सहस्र स्थितिवन्ध व्यतीत होते हैं ॥९६-१०७॥ चूर्णिसू०-तत्पश्चात् अन्य प्रकारका स्थितिबन्ध होता है, अर्थात् एक साथ ही मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध और भी कम हो जाता है । इससे ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, और अन्तराय, इन तीनो ही कर्मोंका स्थितिबन्ध परस्पर तुल्य और असंख्यातगुणा होता है। इससे नाम और गोत्रकर्मका स्थितिवन्ध असंख्यातगुणा होता है। इससे वेदनीय कर्मका स्थितिवन्ध विशेष अधिक होता है। यहाँ पर भी अन्य कोई विकल्प नहीं है । जब ज्ञानावरणादि तीनों ही कर्मोंका स्थितिबन्ध नाम-गोत्रकर्मों के स्थितिवन्धसे नीचे होता & ताम्रपत्रवाली प्रतिमें णत्थि [अण्णो-] ऐसा पाठ मुद्रित है। (देखो पृ० १८३१)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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