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________________ गा० १२३] चारित्रमोह-उपशामक-विशेषक्रिया-निरूपण ६३ सेसे सेसे णिक्खेवो । ५३. तिस्से चेव अणियट्टि-अद्धाए पडमसमए अप्पसत्थ-उवसामणाकरणं णिवत्तीकरणं णिकाचणाकरणं च बोच्छिण्णाणि । ५४. आउगवज्जाणं कम्माणं ठिदिसंतकम्ममंतोकोडाकोडीए। ५५. ठिदिबंधो अंतोकोडीए सदसहस्सपुधत्तं । ५६. तदो ठिदिखंडयसहस्सेसु गदेसु ठिदिबंधो सहस्सपुत्त । ५७. तदो अणियट्टिअद्धाए संखेज्जेसु भागेसु गदेसु असण्णिडिदिबंधेण समगो ठिदिबंधो । ५८. तदो ठिदिबंधपधत्ते गदे चदुरिंदियट्ठिदिवंधसमगो हिदिबंधो । पमके संख्यातवें भागसे हीन होता है । अनुभागकांडक अनुभागसत्त्वके अनन्त बहुभागप्रमाण है । गुणश्रेणी असंख्यातगुणित श्रेणिरूपसे होती है और शेष शेष द्रव्यमें निक्षेप होता है। अर्थात् जिस प्रकारसे अपूर्वकरणमें प्रतिसमय असंख्यातगुणित श्रेणीके द्वारा उदयावलीके बाहिर गलित-शेषायामके रूपसे गुणश्रेणीकी रचना होती है, उसी प्रकार यहॉपर भी गुणश्रेणीकी रचना होती है । उसी अनिवृत्तिकरणकालके प्रथम समयमें अप्रशस्तोपशमनाकरण, निधत्तीकरण और निकाचनाकरण ये तीनो ही करण एक साथ व्युच्छिन्न हो जाते है ॥४२-५३॥ विशेषार्थ-जो कर्म उत्कर्षण, अपकर्पण और पर-प्रकृति-संक्रमणके योग्य होकरके भी उदयस्थितिमें अपकर्षित करनेके लिए शक्य न हो, अर्थात् जिसकी उदीरणा न की जा सके उसे अप्रशस्तोपशामनाकरण कहते हैं। जिस कर्मका उत्कर्षण और अपकर्पण तो किया जा सके, किन्तु उदीरणा अर्थात् उदयस्थितिमें अपकर्षण और पर प्रकृतिमे संक्रमण न किया जा सके, उसे निधत्तीकरण कहते हैं। जिस कर्मका उत्कर्षण, अपकर्पण, उदीरणा और परप्रकृति-संक्रमण ये चारो ही कार्य न किये जा सकें, किन्तु जिस रूपसे उसे बाँधा था, उसी रूपसे वह सत्तामें तदवस्थ रहे, उसे निकाचनाकरण कहते हैं । ये तीनो करण अपूर्वकरणके अन्तिम समय तक होते रहते हैं, किन्तु अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमे ये तीनो बन्द हो जाते हैं। ___ चूर्णिसू०-उस अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमै आयुकर्मको छोड़कर शेप सात कर्मोंका स्थितिसत्त्व अन्तःकोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमाण और स्थितिबन्ध अन्त.कोड़ी अर्थात सागरोपमलक्षपृथक्त्व-प्रमाण होता है। तत्पश्चात् सहस्रो स्थितिकांडकोंके व्यतीत होनेपर स्थिति बन्ध सागरोपम सहस्रपृथक्त्व रह जाता है। तत्पश्चात् अनिवृत्तिकरणकालके संख्यात भागोके व्यतीत होनेपर असंज्ञी जीवोकी स्थितिके बन्धके समान सहस्र सागरोपमप्रमाण स्थितिवन्ध होता है। तत्पश्चात् स्थितिवन्धपृथक्त्वके बीत जानेपर चतुरिन्द्रिय जीवके स्थितिबन्धके १ तत्थ ज कम्ममोकड्डुक्कड्डण परपयडिसकमाण पाओग्ग होदूण पुणो णोसकमुदयटिदिमोकड्डिदु; उदीरणाविरुद्धसहावेण परिणदत्तादो । त तहाविहपइण्णाए पडिग्गहियमप्पसत्थ-उवसामणाए उवसतमिदि भण्णदे। तस्स सो पजायो अप्पसत्थ-उवसामणाकरणं णाम । एव ज कम्ममोकड्डुक्कड्डणासु अविरुद्धसचरणं होदूण पुणो उदय-परपयडि-सकमाणमणागमणपइण्णाए पडिग्गहिय तस्स सो अवस्थाविसेसो णिधत्तीकरण णाम | जयध० * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'अंतो कोडाकोडीए' पाठ मुद्रित है ( देखो पृ० १८२४ )। पर वह अशुद्ध है । (देखो धवला भा० ६ पृ० २९५)।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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