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________________ ६८२ कसाय पाछुड सुत्त [ १४ चारित्रमोह-उपशामनाधिकार णिक्खित्ता । ३९. तदो अणुभागखंडयपुधत्ते गदे अण्णमणुभागवंडयं परमं हिदिखंडयं जो च अपुव्यकरणस्स पढमो हिदिवंधो एदाणि ममगं णिद्विदाणि । ४०. तदो ट्ठिदिखंडयपुधत्ते गदे णिद्दा-पयलाणं बंधवोच्छेदो। ४१. तदो अंतोमुहत्ते गदे पर भवियणामा-गोदाणं बंधवोच्छेदोछ । ४२. अपुवकरणपविट्ठस्स जम्हि णिहा-पयलाओ बोच्छिण्णाओ सो कालो थोवो । ४३. परमवियणामाणं वोच्छिण्णकालो संखेजगुणो । ४४. अपुचकरणद्धा विसेसाहिया । ४५. तदो अपुव्यकरणद्धाए चरिमसमए ठिदिखंडयमणुभागखंडयं ठिदिवंधो च समगं णिट्ठिदाणि । ४६. एदम्हि चेव समए हस्स-रह-भय-दुगुंछाणं बंधवोच्छेदो । ४७. हस्स-रइ-अरइ-सोग-भय-दुगुंछाणमेदेसिं छण्हं कम्माणमुदयवोच्छेदो च । ४८. तदो से काले पढमसमय-अणियट्टी जादो। ४९. पढमसमय-अणियट्टिकरणस्स ठिदिखंडयं पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागो । ५०. अपुन्यो ठिदिबंधो पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागेण हीणो । ५१. अणुभागखंडयं सेसस्स अणंता भागा। ५२.गुणसेडी असंखेज्जगुणाए सेडीए भागकांडक-पृथक्त्वके व्यतीत होनेपर दूसरा अनुभागकांडक प्रथम स्थितिकांडक और अपूर्वकरणका प्रथम स्थितिबन्ध ये सब आवश्यक कार्य एक साथ ही निष्पन्न होते हैं । तत्पश्चात् स्थितिकांडकपृथक्त्वके व्यतीत होनेपर निद्रा और प्रचलाप्रकृतिका बन्ध-विच्छेद होता है । तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त व्यतीत होनेपर पर-भवसम्बन्धी नामकर्म संज्ञावाली प्रकृतियोका वन्धविच्छेद होता है ॥३४-४१॥ चूर्णिस०-अपूर्वकरण गुणस्थानमें प्रविष्ट संयत पुरुपके जिस भागमे निद्रा और प्रचलाप्रकृति बन्धसे व्युच्छिन्न होती है, वह काल सबसे कम है। इससे परभवसम्बन्धी नामकर्मकी प्रकृतियोके वन्धसे व्युच्छिन्न होनेका काल संख्यातगुणा है। इससे अपूर्वकरणका । काल विशेप अधिक है । तत्पश्चात् अपूर्वकरणकालके अन्तिम समयमे स्थितिकांडक, अनुभागकांडक और स्थितिवन्ध, ये सव एक साथ निष्पन्न होते है । इसी समयमे ही हास्य, रति, भय और जुगुप्सा, इन चार प्रकृतियोका बन्ध-विच्छेद होता है और वहाँ ही हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा इन छह कर्मोंका उदयसे विच्छेद होता है। इसके अनन्तर समयमें वह प्रथमसमयवर्ती अनिवृत्तिकरणसंयत हो जाता है। अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमे स्थितिकांडक पल्योपमका संख्यातवॉ भागप्रमाण होता है। अपूर्व अर्थात् नवीन स्थितिबन्ध पल्यो * ताम्रपत्रवाली प्रतिमे इस सूत्रके अनन्तर 'एसो एत्थ सुत्तत्थसम्भावो' यह एक और भी सूत्र मुद्रित है ( देखो पृ० १८२१ )। पर वस्तुतः यह इसी सूत्रकी टीकाका उपसहारात्मक वाक्य है। क्योंकि, इससे भी आगे इसी सूत्राङ्ककी टीका पाई जाती है। + ताम्रपत्रवाली प्रतिमें इस सूत्रके अनन्तर 'एवमणियट्टिकरणं पविट्ठस्स' यह एक और मी सूत्र मुद्रित है ( देखो पृ० १८२२ ) | पर वस्तुतः यह सूत्र नहीं है, अपितु आगेके सूत्रकी उत्थानिकाका प्रारम्भिक अंग है, यह वात प्रकृत स्थलको टीकासे ही सिद्ध है। (देखो पृ० १८२२ की अन्तिम पंक्ति और पृ० १८२३ की प्रथम पक्ति)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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