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________________ ६८० कसाय पाहुड सुस्त [१४ चारित्रमोह-उपशामनाधिकार २०. सम्मत्तस्स पढमद्विदीए झीणाए जं तं मिच्छत्तस्स पदेसग्गं सम्मत्तसम्मामिच्छत्ते सु गुणसंकमेण [ ण ] संकमदि । २१. परमदाए सम्मत्तमुप्पादयमाणस्स जो गुणसंकरण पूरणकालो तदो संखेज्जगुणं कालमिमो उवसंतदंसणमोहणीओ विसोहीए वड्वदि । २२. तेण परं हायदि वा वड्ढदि वा अवट्ठायदि वा । २३. तहा चेव ताव उवसंतदसणमोहणिज्जो असाद अरदि-सोग-अजसगित्ति-आदीसु बंधपरावत्तसहस्साणि कादण* तदो कसाए उवसायेदं कच्चे अधापवत्तकरणस्स परिणामं परिणमह । २४. जं अणंताणुवंधी विसंजोएंतेण हदं दसणमोहणीयं च उवसामेंतेण हदं कम्यं तमुवरिहदं । २५. इदाणिं कसाए उवसातस्स जमधापवत्तकरणं तम्हि णत्थि हिदिघादो अणुभागधादो गुणसेडी च । णवरि विसोहीए अणंतगुणाए वड्वदि । २६. तं चेव इमस्स होता है, अथवा उसमें कोई अन्य विशेषता है, इस शंकाका समाधान चूर्णिकारने वक्ष्यमाणसूत्रोसे किया है। चूर्णिसू०-सम्यक्त्वप्रकृतिकी प्रथम स्थितिके क्षीण होनेपर जो मिथ्यात्वका प्रदेशाग्र अवशिष्ट रहता है, वह सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वमे गुणसंक्रमणसे संक्रान्त नहीं करता है, अर्थात् जिस प्रकार प्रथम वार सम्यक्त्वके उत्पादन करनेवाले जीवके गुणसंक्रमण होता है, उस प्रकारसे यहॉपर गुणसंक्रमण नहीं होता है, किन्तु इसके केवल विध्यातसंक्रमण ही होता है। प्रथम वार सम्यक्त्वको उत्पन्न करनेवाले जीवका जो गुणसंक्रमणसे पूरणकाल है, उससे संख्यातगुणित काल तक यह उपशान्तदर्शनमोहनीय जीव विशुद्धिसे बढ़ता है। इसके पश्चात् वह ( संक्लेश और विशुद्धिरूप परिणामोके योगसे ) कभी विशुद्धिसे हीनताको प्राप्त होता है, कभी वृद्धिको प्राप्त होता है और कभी अवस्थित परिणामरूप रहता है। पुनः वही उपशान्तदर्शनमोहनीय जीव असाता, अरति, शोक, और अयशःकीर्ति आदि प्रकृतियोमे सहस्रों बन्ध-परावर्तन करके अर्थात् सहस्रो वार प्रमत्तसंयतसे अप्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतसे प्रमत्तसंयत हो करके, तत्पश्चात् कपायोके उपशमानेके लिए अधःप्रवृत्तकरणके परिणामसे परिणत होता है। जो कर्म अनन्तानुवन्धी कपायके विसंयोजन करनेवालेने नष्ट किया; वह 'हत' कहलाता है और जो कर्म दर्शनमोहनीयके उपशमन करनेवालेके द्वारा नष्ट किया जाता है, वह उपरि-हत कर्म कहलाता है ॥२०-२४॥ चूर्णिसू०-इस समय कपायोके उपशमन करनेवाले जीवके जो अधःप्रवृत्तकरण होता है, उसमे स्थितिघात, अनुभागघात और गुणश्रेणी नहीं होती है । केवल अनन्तगुणी विशुद्धिसे प्रतिसमय बढ़ता रहता है। इस अधःप्रवृत्तकरणका भी वही लक्षण है, जो कि पहले दर्शनमोहकी उपशमनाके समय प्ररूपण कर आये हैं । तत्पश्चात् अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमे ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'कादण' पदसे आगे 'जहा अणताणुबंधी विसंजोएद्रण सत्थाणे पदिदो असादादिवंधपाओग्गो होदि' इतना टोकाश भी सूत्ररूपसे मुद्रित है। ( देखो पृ० १८१५ ) । + जयधवलाकारने अपनी व्याख्याकी सुविधार्थ इस सूत्रको दो भागोंमें विभक्त किया है, पर वस्तुतः यह एक ही सूत्र है।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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