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________________ गा० १२३] चारित्रमोह-उपशामक स्वरूप-निरूपण ६७९ १७. अपुवकरणस्स जं पढमसमए हिदिसंतकम्मं तं चरिमसमए संखेज्जगुणहीणं । १८. दंसणमोहणीय उवसामणअणियट्टिअद्धाए संखेज्जेसु भागेसु गदेसु सम्मत्तस्स असंखेज्जाणं समयपवद्धाणमुदीरणा । १९. तदो अंतोमुहुत्तेण दसणमोहणीयस्स अंतरं करेदि । चूर्णिसू०-अपूर्वकरणके प्रथम समयमे जो स्थितिसत्त्व होता है, वह अपूर्वकरणके अन्तिम समयमे उससे संख्यातगुणित हीन हो जाता है। ( इसी प्रकार अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें जो स्थितिसत्त्व होता है, उससे अन्तिम समयमे वह संख्यातगुणित हीन हो जाता है ।) दर्शनमोहनीयके उपशमन करनेवाले जीवके अनिवृत्तिकरणकालके संख्यात भागोके व्यतीत होनेपर सम्यक्त्वप्रकृतिके असंख्यात समयप्रबद्धोकी उदीरणा होती है। तत्पश्चात् एक अन्तर्मुहूर्त के द्वारा दर्शनमोहनीयका अन्तर करता है ॥१७-१९॥ विशेषार्थ-दर्शनमोहका अन्तरकरणको करनेवाला जीव सम्यक्त्वप्रकृतिकी अन्तमुहूर्तप्रमाण स्थितिको छोड़कर, तथा मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उदयावलीको छोड़कर शेष स्थितिका अन्तर करता है। इस अन्तरकालीन स्थितियोके उत्कीरण किये जानेवाले प्रदेशाग्रको बन्धका अभाव हो जानेसे द्वितीय स्थितिमें संक्रमण नहीं करता है, किन्तु सर्व द्रव्यको लाकर सभ्यक्त्वप्रकृतिकी प्रथमस्थितिमे निक्षिप्त करता है। तथा सम्यक्त्वप्रकृतिके द्वितीय स्थितिसम्बन्धी प्रदेशाग्रका उत्कीरण कर अपनी प्रथमस्थितिमे गुणश्रेणीके रूपसे निक्षिप्त करता है । इसी प्रकार मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वके भी द्वितीयस्थितिके प्रदेशाग्रको उत्कीरण कर सम्यक्त्वप्रकृतिकी प्रथमस्थितिमे देता है, तथा अनुत्कीर्यमाण स्थितियोमे भी देता है, किन्तु अपनी अन्तर-स्थितियोमें नहीं देता है। सम्यक्त्वप्रकृतिकी प्रथमस्थितिके समान स्थितियोंमे स्थित मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतियोके उदयावलीके बाहिर स्थित प्रदेशाग्रको सम्यक्त्वप्रकृतिकी प्रथम स्थितियोमे संक्रमण करता है। इस प्रकारसे यह क्रम अन्तरकरणकी द्विचरम फालीके प्राप्त होने तक रहता है। पुनः अन्तिम फाल के निपतनकालमे मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी सव अन्तरस्थितियोके प्रदेशाग्रको सम्यक्त्वप्रकृतिकी प्रथमस्थितिमें संक्रमण करता है । इसी प्रकार सम्यक्त्वप्रकृतिके चरमफालिसम्बन्धी द्रव्यको अन्यत्र संक्रमित नहीं करता है, किन्तु अपनी प्रथमस्थितिमे ही संक्रमित करता है । द्वितीयस्थितिके प्रदेशाग्रको भी प्रथमस्थितिमें ही तब तक निक्षिप्त करता है, जब तक कि प्रथमस्थितिमें आवली और प्रत्यावली शेष रहती हैं। इसके पश्चात् आगाल और प्रत्यागालका कार्य समाप्त हो जाता है। इस समय गुणश्रेणीरूप विन्यास नहीं होता है, किन्तु प्रत्यावलीसे ही उदीरणा होती रहती है। एक समय-अधिक आवलीके शेष रह जानेपर सम्यक्त्वप्रकृतिकी जघन्य स्थिति-उदीरणा होती है। तत्पश्चात् प्रथमस्थितिके अन्तिम समयमें अनिवृत्तिकरणका काल समाप्त हो जाता है और तदनन्तर समयमें वह सम्यग्दृष्टि हो जाता है। उस समय प्रथमोपशमसम्यक्त्वकी प्राप्तिके समान अन्तर्मुहूर्तकाल तक क्या भिथ्यात्वका गुणसंक्रमण यहाँ भी
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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