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________________ कसायपाहुडसुत्त (१०)- कम्हा ? जेण एगिदियादयो जाव पंचिदिया सव्वे तिरिय त्ति काउं । (सतकचू० पृ०५) किंकारणं ? भएणति-अतिचिरकालद्वातिणि ठाणा थोवा भवंति ति काउं । (कम्मप० पृ० ३३।२) ऊपर दिये गये अवतरणोंसे पाठक स्वयं ही अनुभव करेंगे कि उपर्युक्त चारों चूर्णियाँ एक ही आचार्यको कृतियां हैं। कम्मपयडीचूर्णिको भाषाके विषयमें यह बात ध्यान देनेके योग्य है कि मुद्रित कम्मपयडीचणि में जिस प्रकारको भापा आज उपलब्ध है, वैसी पहले नहीं थी, किन्तु कसायपाहुडचूर्णिकी भापाके ही समान थी। कम्मपयडीके संस्कृतटीकाकार आ० मलयगिरिने अपनी टीकामें-जोकि चूर्णिके आधार पर ही रची गई है जहाँ कहीं अपने कथनकी पुष्टिके लिए चर्णिके कुछ वाक्योंको उद्धृत किया है, उन वाक्योंकी भापा मुद्रित चर्णिकी भापासे भिन्न है और कसायपाहुडचूर्णि की भापाके समान है। प्रा० मलयगिरिके ५०० वर्ष पश्चात् सत्तरहवीं शताब्दीमें उ० यशोविजयजीने कम्मपयडीपर जो विस्तृत संस्कृतटीका रची है, उसमें भी चार-छह स्थलोंपर चूर्णि के उद्धरण दिये हैं, उनकी भी भापा मुद्रित चूर्णिसे भिन्न है । इससे ज्ञात होता है कि आजसे ढाई-तीनसौ वर्षके पहले तक कम्मपयडीचर्णिकी भापा विभिन्न रही है । किन्तु इन ढाई-तीनसौ वोके भीतर ही किसी समय जानबूझकर उक्त चर्णिकी भापा परिवर्तित की गई है, ऐसा निश्चय मुद्रित कम्मपयडीचूर्णिके पालोड़नसे होता है । भाषामे किस प्रकारका परिवर्तन किया गया है, इसके लिए एक नमूना उपस्थित किया जाता है . 'ताओ किट्टीओ पढमसमए केवडियाओ णिव्यत्तेदि' ? इस वाक्यका भाषापरिवर्तन इस प्रकार किया गया है तातो किट्टीतो पढमसमते केवडियातो णिव्यत्तेति ? मुद्रित सम्पूर्णकी भापा इसी प्रकारकी है। यहां पर कम्मपयडीकी दोनों संस्कृतटीकाओं से ऐसे कुछ अवतरण दिये जाते है, जिनसे कि भापा-परिवर्तनका निश्चय पाठकोंको भलीभांति से हो सके(१) मुद्रित पाठ-'पिण्डपगडीतो नामपगडीतो' । (कम्मप० बन्ध० ५० ७२ पृ० १) सस्कृत टीकागतपाठ-'पिडपगईश्रो णामपगईओ' । ( कम्मप० बन्ध० प० ७२ पृ०२) (२) मुद्रितपाठ-'पृहत्तसहो वहत्तवाची'। (कम्मप० वन्ध० प० १६३ पृ० २) सं० टीकागत पाठ-'पुहत्तसदो बहत्तवाड ति। (कम्मप० बन्ध० ५० १६४ पृ० १) (३) मुद्रित पाठ-'बन्धद्वितीतो संतकम्मदिती संखेजगणा' । (कम्मप० संक० प० ५६ पृ०१) म. टीकागत पाठ-'बंधद्धिईयो संतकम्मढिई संखिजगुणा' । (कम्मप० संक० ५० ५६) (१) मुद्रितपाठ-'एत्थ वाघात इति द्वितिघातो' । ( कम्मप० सक० ५० १४६ पृ० १) सं० टीकागतपाठ--'ठियायो एत्थ होड वाघायो । (कम्मप० सक० ५० १४७ पृ० २) (५) मुद्रितपाठ-'तं बारिसे न मिलति ति ण इच्छिजति । ( कम्मप० सत्ता० प० ३७ ) सं० ठोकागत पाठ-'तं आरिसे न मिलह तेण ण इच्छिाई' । (कम्मपसत्ता०प० २७
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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