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________________ ६६७ गा० ११५ ] - संयमासंयमलब्धिस्थान-निरूपण क्खजोणियस्स पडिचदमाणयस्स उक्कस्सयं लट्ठिाणमणतगुणं । ७७. मणुससंजदासंजदस्स पडियदमाणगस्स उक्स्सयं लद्धिट्ठाणमणंतगुणं । ७८. मणुसस्स पडि वज्जमाणगस्स जहण्णायं लट्ठिाणमणंतगुणं । ७९. तिरिक्खजोणियस्स पडिवज्जमाणगस्स जहण्णय लट्ठिाणमणंतगुणं । ८०. तिरिक्ख जोणियस्स पडिवडमाणयस्स उकस्सयं लद्धिट्ठाणमणतगुणं । ८१. मणुसस्स पडिवज्जमाणगस्स उक्कस्सयं लद्धिहाणपणंतगुणं । ८२. मणुसस्स अपडिवज्जमाणअपडि वदमाणयस्स जहण्णयं लद्धिट्ठाणमणंतगुणं.। ८३. तिरिक्खजोणियस्स अपडिवज्जमाण-अपडिवदमाणयस्स जहण्णयं लद्धिट्टाणमणंतगुणं । ८४. तिरिक्खजोणियस्स अपडिवजमाण-अपडिवदमाणयस्स उक्कस्सयं लट्ठिाणमणंतगुणं । ८५. मणुसस्स अपडिवजमाण-अपडिवदमाणयस्स उकस्सयं लद्धिट्ठाणमणंतगुणं । ', . . ८६. संजदासंजदो अपञ्चक्खाण कसाए ण वेदयदि । ८७. पञ्चस्खाणावरणीया वि संजमासंजमस्स ण किंचि आवरेंति। ८८. सेसा चदुकसाया णवणोकसायवेदणीयाणि च उदिण्णाणि देमघादि करेंति संजमासंजमं । ८९ जइ पञ्चक्खाणावरणीयं वेदेंतो सेसाणि चरित्तमोहणीयाणि ण वेदेज्ज तदो संजमासंजमलद्धी खड्या होज १ ९०. एकेण वि उदिण्णेण खओवसमलद्धी भवदि । उत्कृष्ट लब्धिस्थान अनन्तगुणित है। इससे प्रतिपतमान मनुष्य संयतासंयतका उत्कृष्ट लब्धिः स्थान अनन्तगुणित है। इससे प्रतिपद्यमान अर्थात् संयमासंयमको प्राप्त करनेवाले मनुष्यः का जघन्य लब्धिस्थान अनन्तगुणित है। इससे प्रतिपद्यमान तिर्यग्योनिक जीवका जघन्य लब्धिस्थान अनन्तगुणित है। इससे प्रतिपद्यमान तिर्यग्योनिक जीवका उत्कृष्ट लब्धिस्थान अनन्तगुणित है। इससे प्रतिपद्यमान मनुष्यका उत्कृष्ट लब्धिस्थान अनन्तगुणित है। इससे अप्रतिपद्यमान-अप्रतिपतमान मनुप्यका जघन्य लब्धिस्थान अनन्तगुणित है। इससे अप्रतिपद्यमान-अप्रतिपतमान तिर्यग्योनिक जीवका जघन्य लब्धिस्थान अनन्तगुणित है । इससे अप्रतिपद्यमान-अप्रतिपतमान तिर्यग्योनिक जीवका उत्कृष्ट लब्धिस्थान अनन्तगुणित है। इससे अप्रतिपद्यमान-अप्रतिपतमान मनुष्यका उत्कृष्ट लब्धिस्थान अनन्तगुणित है ।।७२-८५॥ । चूर्णिसू०-संयतासंयत जीव अप्रत्याख्यानावरण कषायका वेदन नहीं करता है। प्रत्याख्यानावरणीय कषाय भी संयमासंयमका कुछ भी आवरण नहीं करती हैं। शेप चार संज्वलन कषाय और नव नोकषायवेदनीय, ये उदयको प्राप्त होकर संयमासंयमको देशघाती करती हैं । यदि प्रत्याख्यानावरणीय कषायको वेदन करता हुआ संयतासंयत शेष चारित्रमोहनीय-प्रकृतियोंका वेदन न करे, तो संयमासंयमलब्धि क्षायिक हो जाय । अतएव चार संज्वलन और नव नोकषाय, इनमेसे एक भी कपायके उदय होनेसे संयमासंयमलब्धि क्षायोपशमिक सिद्ध होती है । ( फिर जहाँ तेरह कषायोका उदय होवे, वहाँ तो नियमसे वह क्षायोपशमिक ही होगी। ) ॥८६-९०॥ ___ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'करेदि' पाठ मुद्रित है (देखो पृ० १७९४) । ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'तदा' पाठ मुद्रित है । ( देखो पृ० १९७४)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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