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________________ ६५७ गा० ११५] दर्शनमोहक्षपक स्थित्यादि-अल्पबहुत्व-निरूपण ११६. जम्हि द्विदिखंडए अवगदे दंसणमोहणीयस्स पलिदोवममेत्तं डिदिसंतकम्मं होइ, तं द्विदिखंडयं संखेज्जगुणं । ११७. अपुचकरणे पडमडिदिखंडयं संखेज्जगुणं । ११८. पलिदोवममेत्ते द्विदिसंतकम्मे जादे तदो पढमं हिदिखंडयं संखेज्जगुणं । ११९. पलिदोवमहिदिसंतकम्मं विसेसाहियं । १२०. अपुचकरणे पढमस्स उक्कस्सगढिदिखंडयस्स विसेसो संखेज्जगुणो । १२१. दंसणमोहणीयस्स अणियट्टिपहमसमयं पविट्ठस्स द्विदिसंतकम्मं संखेज्जगुणं । १२२. दंसणमोहणीयवज्जाणं कम्माणं जहण्णओ द्विदिबंधो संखेज्जगुणो । १२३. तेसिं चेव उक्कस्सओ हिदिबंधो संखेजगुणो । १२४. दसणमोहणीयवज्जाणं जहण्णयं डिदिसंतकम्मं संखेज्जगुणं । १२५. तेसिं चेव उक्स्सयं द्विदिसंतकम्म संखेज्जगुणं । १२६.एदम्हि दंडए समत्ते सुत्तगाहाओ अणुसंवण्णेदवाओ। १२७ संखेज्जा च मणुस्सेसु खीणमोहा सहस्ससो णियमा त्ति एदिस्से गाहाए अट्ठ अणियोगद्दाराणि । तं जहा-संतपरूवणा दव्वपमाणं खेत्तं फोसणं कालो अंतरं भागाभागो अप्पाबहुअं च । १२८. एदेसु अणिओगद्दारेसु वण्णिदेसु दंसणमोहक्खवणा त्ति समत्तमणिओगद्दारं । स्थितिकांडकके नष्ट होनेपर दर्शनमोहनीयकर्मका पल्योपमप्रमाण स्थितिसत्त्व रहता है, वह स्थितिकांडक संख्यातगुणित है। इससे अपूर्वकरणमे होनेवाला प्रथम स्थितिकांडक संख्यातगुणित है। अपूर्वकरणमे होनेवाले प्रथम स्थितिकांडकसे पल्योपममात्र स्थितिसत्त्वके होनेपर तत्पश्चात् होनेवाला प्रथम स्थितिकांडक संख्यातगुणित है। इससे पल्योपमप्रमाण स्थितिसत्त्व विशेष अधिक है । पल्योपमप्रमाण स्थितिसत्त्वसे अपूर्वकरणमे होनेवाले प्रथम उत्कृष्ट स्थितिकांडकका विशेष संख्यातगुणित है । ( क्योकि उसका प्रमाण सागरोपम-पृथक्त्व है।) इससे अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमे प्रविष्ट हुए जीवके दर्शनमोहनीय कर्मका स्थितिसत्त्व संख्यातगुणित है । ( क्योकि, उसका प्रमाण सागरोपमशतसहस्र-पृथक्त्व है। अनिवृत्तिकरणप्रविष्ट प्रथम-समयवर्ती जीवके दर्शनमोहनीयके स्थितिसत्त्वसे दर्शनमोहनीयको छोड़कर शेष कर्मोंका जघन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणित है । (क्योकि, कृतकृत्यवेदकका प्रथमसमयसम्बन्धी स्थितिबन्ध अन्तःकोड़ाकोड़ी सागरोपम माना गया है । ) इस जघन्य स्थितिबन्धसे उन्हीं कर्मोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध संख्यातगुणित है। उक्त कर्मों के उत्कृष्ट स्थितिबन्धसे दर्शनमोहनीयके विना शेष कर्मोंका जघन्य स्थितिसत्त्व संख्यातगुणित है । इस जघन्य स्थितिसत्त्वसे उन्हीं कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिसत्त्व संख्यातगुणित है ॥९१-१२५॥ ___ चूर्णिसू०-इस अल्पबहुत्व-दंडकके समाप्त होनेपर सूत्र-गाथाओका अवयवार्थपरामर्शपूर्वक सम्यक् प्रकारसे व्याख्यान करना चाहिए ॥१२६॥ चूर्णिसू०-'संखेज्जा च मणुस्सेसु खीणमोहा सहस्ससो णियमा' इस पॉचवी गाथामें आठ अनुयोगद्वार ज्ञातव्य हैं । वे इस प्रकार हैं-सत्प्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणानुगम, क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम, कालानुगम, अन्तरानुगम, भागाभागानुगम और अल्पबहुत्व । इन अनुयोगद्वारोंके वर्णन करनेपर दर्शनमोहक्षपणा नामका अधिकार समाप्त होता है ॥१२७-१२८॥ ८३
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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