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________________ Ր ११ दंसणमोहक्खवणा- अत्थाहियारो १. दंसणमोहक्खवणाए पुव्वं गमणिजाओ पंच सुत्तगाहाओ । २. तं जहा । (५७) दंसणमोहक्खवणापट्टवगो कम्मभूमिजादो दु । णियमा मणुसगदीए पिट्टवगो चावि सव्वत्थ ॥ ११० ॥ ११ दर्शनमाहक्षपणा - अर्थाधिकार चूर्णिसू० - दर्शनमोहकी क्षपणके विषयमें पहले ये पॉच सूत्रगाथाएँ प्ररूपण करना चाहिए । वे इस प्रकार है ॥ १-२ ॥ 1 नियमसे कर्मभूमि में उत्पन्न हुआ और मनुष्यगतिमें वर्तमान जीव ही दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रस्थापक ( प्रारम्भ करनेवाला ) होता है । किन्तु उसका निष्ठापक ( पूर्ण करनेवाला ) चारों गतियोंमें होता है ॥ ११० विशेषार्थ - दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारम्भ कर्मभूभिज वेदकसम्यग्दृष्टि मनुष्य ही कर सकता है, अन्य नही । क्योकि अन्य गतियोमे उत्पन्न हुए जीवोंके दर्शनमोहकी क्षपणा के योग्य परिणामोका होना असंभव है, इस बातको बतलाने के लिए ही गाथासूत्रमे 'नियमसे ' यह पद दिया गया है | वह कर्मभूमिज मनुष्य भी सुषम- दुषमा और दुषम-सुपमा-कालमे उत्पन्न होना चाहिए । वह भी तीर्थंकर - केवली, सामान्य- केवली या श्रुत- केवलीके पादमूलमें दर्शनमोहका क्षपण प्रारम्भ कर सकता है, अन्यत्र नही । इसका कारण यह है कि तीर्थंकरादिके माहात्म्य आदिके देखनेपर ही दर्शनमोहकी क्षपणाके योग्य विशुद्ध परिणामो होना संभव है । यद्यपि इस गाथामे केवली आदिके पादमूलका उल्लेख नहीं है, तथापि षट्खंडागमकी सम्यक्त्व - चूलिका में श्री भूतबलि आचार्य ने 'जम्हि जिणा केवली तित्थयरा तम्हि आढवेदि ' ऐसा स्पष्ट कथन किया है । इस प्रकार दर्शनमोहका क्षपण प्रारम्भ करनेवाला मनुष्य यदि बद्धायुष्क है, अर्थात् चारो गति - सम्बन्धी आयुमे से किसी भी एक आयुको वॉध चुका है, और दर्शनमोहका क्षपण प्रारम्भ करनेके पश्चात् कृतकृत्यवेदक कालके भीतर ही मरणको प्राप्त करता है, तो वह चारो ही गतियोंमें दर्शनमोहका क्षपण पूर्ण करता है। यहाॅ इतना विशेष जानना कि नरकोंमेंसे प्रथम नरकके भीतर, तिर्यंचोमेंसे भोगभूमिया पुरुषवेदी तिर्यचो में, मनुष्योमेसे भोगभूमियॉ पुरुषो में और देवोमेंसे सौधर्मादि कल्पवासी देवोमे ही उत्पन्न होकर दर्शनमोहकी क्षपणा पूर्ण करेगा, अन्यत्र नही । इस अर्थविशेषको बतलानेके लिए गाथासूत्र में 'निष्ठापक चारो गतियोमे होता है' ऐसा कहा है ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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