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________________ ६३५ "1 ___ गा० १०५ ] . उपशासक-विशेषस्वरूप-निरूपण : (५१) सम्मत्तपढमलंभो सम्बोवसमेण तह वियटेण। .. {- भजियवों य अभिक्खं सव्वोवसमेण देसेण ॥१०४॥ . (५२) सम्भत्तपढमलंभस्सऽणंतरं पच्छदो य मिच्छत्तं । लंबस्स अपढमस्स दु भजियव्यो पच्छदो होदि ॥१०॥ . कर्मोंमेंसे किसी एक कर्मका नियमसे उदय हो जाता है । यदि सम्यक्त्वप्रकृतिका उदय होता है तो वह वेदकसम्यग्दृष्टि बन जाता है, यदि सम्यग्मिथ्यात्वकर्मका उदय होता है तो सम्यग्मिथ्यादृष्टि बन जाता है और यदि मिथ्यात्वका उदय होता है तो मिथ्यादृष्टि बन जाता है। अनादिमिथ्यादृष्टि जीवके सम्यक्त्वका प्रथम वार लाम सर्वोपशमसे होता है । सादिमिथ्यादृष्टियों में जो विप्रकृष्ट जीव है, वह भी सर्वोपशमसे ही प्रथमोपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करता है। किन्तु जो अविप्रकृष्ट सादि मिथ्यादृष्टि है, और जो अभीक्ष्ण अर्थात् वार-वार सम्यक्त्वको ग्रहण करता है, वह सर्वोपशम और देशोपशमसे 'भजनीय है, अर्थात् दोनों प्रकारसे प्रथमोपशमसम्यस्त्वको प्राप्त होता है ॥१०४॥ विशेपार्थ-दर्शनमोहकी मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति, इन तीनो ही प्रकृतियोका अधःकरणादि तीनो परिणाम-विशेपोके द्वारा उदयाभाव करनेको सर्वोपशम कहते हैं । मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वके उदयाभावरूप उपशमके साथ सम्यक्त्वप्रकृतिसम्बन्धी देशघाती स्पर्धोंके उदयको देशोपशम कहते है । अनादिमिथ्याघष्टि जीव प्रथम वार जो उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करता है, वह नियमतः सर्वोपशमसे ही करता है। जो जीव एक वार भी सम्यक्त्वको पाकर पुनः मिथ्यादृष्टि होता है, उसे सादिमिथ्यादृष्टि कहते हैं । सादिमिथ्यादृष्टि भी दो प्रकारके होते हैं-विप्रकृष्ट सादिमिथ्यादृष्टि और अविप्रकृष्ट सादिमिथ्यादृष्टि । जो सम्यक्त्वसे गिरकर और मिथ्यात्वको प्राप्त होकर वहॉपर सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृविकी उद्वेलना कर पल्योपमके असंख्यातवे भागमात्र कालतक, अथवा इससे भी ऊपर देशोन अर्धपुद्गलपरिवर्तन काल तक संसारमे परिभ्रमण करते हैं, उन्हें - विप्रकृष्ट सादिमिथ्यादृष्टि कहते है। जो मिथ्यात्वमे पहुँचने के पश्चात् पल्योपमके असं ख्यातवे भागके भीतर ही भीतर सम्यक्त्व ग्रहण करनेके अभिमुख होते है, उन्हें अविप्रकृष्ट सादिमिथ्यादृष्टि कहते हैं। इनमें से विप्रकृष्ट सादिमिथ्यादृष्टि तो नियमसे सर्वोपशमके द्वारा ही प्रथमोपशमसम्यक्त्वका लास करता है। किन्तु अविप्रकृष्ट सादिमिथ्यादृष्टि सर्वोपशमसे भी और देशोपशमसे भी प्रथमोपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करता है । इसका कारण यह है कि जो सम्यक्त्वसे गिरकर पुनः पुनः अल्पकालके द्वारा वेदक-प्रायोग्यकालके भीतर ही सम्यक्त्वको ग्रहण करनेके अभिमुख होता है, वह तो देशोपशमके द्वारा सम्यक्त्वका लाभ करता है, अन्यथा सर्वोपशमसे सम्यक्त्वका लाभ करता है। सम्यक्त्वकी प्रथम वार प्राप्तिके अनन्तर और पश्चात् मिथ्यात्वका उदय होता है। किन्तु अप्रथम वार सम्यक्त्वकी प्राप्तिके पश्चात् वह भजितव्य है ॥१०५॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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