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________________ ६३४ फसाय पाहुडे सुत्त । [१० सम्यक्त्व-अर्थाधिकार (४९) सम्मामिच्छाइट्ठी दंसणमोहस्सऽबंधगो होइ । __वेदयसम्माइट्ठी खीणो वि अबंधगो होइ ॥१०२॥ (५०) अंतोमुत्तमद्ध सव्वोवसमेण होइ उपसंतो। तत्तो परमुदयो खलु तिण्णेकदरस्स कम्मरस ॥१०३॥ और उसके मिथ्यात्वका, तथा मिथ्यात्वके निमित्तसे बंधनेवाले अन्य कर्मोंका वन्ध होता रहता है । यद्यपि यहाँपर असंयम, कषाय आदि अन्य प्रत्ययोसे भी कर्मोंका वन्ध होता है, तथापि उनकी यहाँ विवक्षा नहीं की गई है, क्योकि जहॉपर मिथ्यात्वप्रत्यय विद्यमान है वहाँ पर असंयमादि शेष प्रत्ययोंका अस्तित्व स्वतः सिद्ध है । अन्तरमें प्रवेश करनेके प्रथम समयसे लेकर उपशमसम्यक्त्वके कालके भीतर मिथ्यात्वनिमित्तक वन्ध नहीं होता है। किन्तु जब उपशमसम्यक्त्वका काल समाप्त हो जाता है, तब मिथ्यात्वनिमित्तक बन्ध मिथ्यात्वको प्राप्त होनेवाले जीवके तो होता है, किन्तु सम्यग्मिथ्यात्व या सम्यक्त्वप्रकृतिके उदयको प्राप्त होनेवाले जीवके नहीं होता है । जयधवलाकारने 'आसाणे' पदका अर्थ 'णत्थि' पदका अध्याहार करके यह किया है कि सासादनसम्यग्दृष्टिके भी मिथ्यात्व-निमित्तक वन्ध नहीं होता है । सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव दर्शनयोहका अवन्धक होता है। इसी प्रकार वेदकसम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, तथा 'अपि' शब्दसे सूचित उपशमसम्यग्दृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीव भी दर्शनमोहका अवन्धक होता है ।।१०२।। विशेषार्थ-जयधवलाकारने 'अथवा' कहकर इस गाथासूत्रके एक और भी अर्थविशेषको व्यक्त किया है। वह यह कि जिस प्रकार मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यात्वकर्मके उदयसे मिध्यात्वकर्मका वन्ध करता है, उस प्रकार क्या सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव सम्यग्मिथ्यात्वके उदय होनेसे सम्यग्मिथ्यात्वकर्मका और वेदकसम्यग्दृष्टि जीव सम्यक्त्वप्रकृतिका उदय होनेसे सम्यक्त्वप्रकृतिका वन्ध करता है ? इस प्रश्नका उत्तर यह है कि सम्यग्मिथ्यादृष्टि न तो सम्यग्मिथ्यात्वका वध करता है और न वेदकसम्यग्दृष्टि सम्यक्त्वप्रकृतिका वन्ध करता है । इसका कारण यह है कि इन दोनों प्रकृतियोंको कर्मसिद्धान्तमे बन्धप्रकृतियोंमे नहीं गिनाया गया है। क्षायिकसम्यग्दृष्टि तो दर्शनमोहका अबंधक होता ही है, क्योकि वह तो तीनो ही प्रकृतियोंका क्षय कर चुका है। उपशमसम्यग्दृष्टि जीवके दर्शनमोहनीयकर्म अन्तर्मुहर्तकाल तक सर्वोपशमसे उपशान्त रहता है। इसके पश्चात् नियमसे उसके मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति इन तीन कर्मोमेंसे किसी एक कर्मका उदय हो जाता है ।।१०३॥ विशेपार्थ-गाथासूत्रमें पठित्त 'अन्तर्मुहूर्तकाल' इस पदसे अन्तर-कालकी दीर्घताके संख्यातवें भागका ग्रहण करना चाहिए। सर्वोपशमका अभिप्राय यह है कि उपशमसम्यक्त्वके कालमें दर्शनमोहनीयकी तीनो प्रकृतियोंका प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशसम्बन्धी उदय सर्वथा नहीं पाया जाता है। उपशमसम्यक्त्वका काल समाप्त होनेपर तीनों
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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