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________________ ६३० कसाय पाहुड सुत्त [१० सम्यक्त्व-अर्थाधिकार १२५. गुणसेढिणिक्खेबो विसेसाहिओ। १२६. उवसंतद्धा संखेज्जगुणा । १२७. अंतरं संखेज्जगुणं । १२८. जहणिया आवाहा संखेज्जगुणा । १२९. उक्कस्सिया आवाहा संखेज्जगुणा । १३०. जहण्णयं द्विदिखंडयमसंखेज्जगुणं । १३१. उक्कस्सयं द्विदिखंडयं संखेज्जगुणं । १३२. जहण्णगो हिदिवंधो संखेन्जगुणो । १३३. उक्स्सगो हिदिवंधो संखेन्जगुणो । १३४. जहण्णयं द्विदिसंतकम्म संखेज्जगुणं । १३५. उक्कस्सयं हिदिसंतकम्मं संखेज्जगुणं । १३६. एवं पणुवीसदिपडिगो दंडगो समत्तो । १३७. एत्तो सुत्तफासो काययो भवदि । (४२) दंसणमोहस्सुवसामगो दु चदुसु वि गदीसु बोद्धव्यो । पंचिंदिओ य सण्णी णियमा सो होइ पजत्तो ॥१५॥ (४३) सव्वणिरय-भवणेसु दीव-समुद्दे गह [गुह] जोदिसि-विमाणे। अभिजोग्ग-अणभिजोग्गा उवसामो होइ बोद्धव्वो ॥१६॥ श्रेणीका निक्षेप अर्थात् आयाम विशेष अधिक है (१५) । इससे उपशमसम्यक्त्वका काल संख्यातगुणा है (१६)। इससे अन्तर-सम्बन्धी आयाम संख्यातगुणा है (१७) । इससे जघन्य आवाधा संख्यातगुणी है (१८) । इससे उत्कृष्ट आवाधा संख्यातगुणी है (१९) । इससे ( अपूर्वकरणके प्रथम समयमे संभव ) जघन्य स्थितिखंड असंख्यातगुणा है (२०)। इससे अपूर्वकरणके प्रथम समयमें होनेवाला उत्कृष्ट स्थितिखंड संख्यातगुणा है (२१)। इससे मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिवन्ध संख्यातगुणा है (२२) । इससे अपूर्वकरणके प्रथम समयमे संभव उत्कृष्ट स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है (२३) । इससे मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है (२४)। इससे मिथ्यात्वका उत्कृष्ट स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है (२५)। यह जघन्य और उत्कृष्ट स्थितिसत्त्व अपूर्वकरणके प्रथम समयमे ही जानना चाहिए । इस प्रकार यह पञ्चीस पदवाला अल्पवहुत्व-दंडक समाप्त हुआ ॥११२-१३६॥ चूर्णिसू०-अव इससे आगे गाथा सूत्रोका अर्थ प्रकट करने योग्य है ॥१३७॥ दर्शनमोहनीय कर्मका उपशम करनेवाला जीव चारों ही गतियोंमें जानना चाहिए । वह जीव नियमसे पंचेन्द्रिय, संज्ञी और पर्याप्तक होता है ॥१५॥ उक्त गाथाके द्वारा सम्यग्दर्शनके उत्पन्न करनेकी योग्यतारूप प्रायोग्यलब्धिका निरूपण किया गया है। ग्रन्थकार उसीका और भी स्पष्टीकरण करनेके लिए उत्तरगाथासूत्र कहते हैं इन्द्रक, श्रेणीबद्ध आदि सर्व नरकोंमें, सर्व प्रकारके भवनवासी देवोंमें, सर्व१ जम्मि काले मिच्छत्तमुवसतभावेणच्छदि सो उसमसम्मत्तकालो उवसतद्धा त्ति भण्णदे । जयध० & ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'पंचिंदियसणी [पुण-]' ऐसा पाठ मुद्रित है। (देखो पृ० १७२८) ' ताम्रपत्रवाली प्रतिमें '-मणभिजोग्गो' पाठ मुद्रित है। (देखो पृ० १७२९)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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