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________________ कसाय पाहुड सुन्त [ १० सम्यक्त्व अर्थाधिकार पडिआवलियादो चेव उदीरणा । १०१. आवलियाए सेसाए मिच्छत्तस्स घादो णत्थि । १०२. चरिमसमयमिच्छाड्डी से काले उवसंतदंसणमोहणीओ' । १०३. ताधे चैव तिण्णि कम्मंसी उप्पादिदौ । १०४. पडमसमय वसंतदंसणमोहणीओ मिच्छत्तादो सम्मामिच्छत्ते बहुगं पदेसग्गं देदि । सम्मत्ते असंखेज्जगुणहीणं पदेसग्गं देदि । १०५. विदियसमए सम्मत्ते असंखेज्जगुणं देदि । १०६. सम्मामिच्छत्ते असंखेज्जगुणं देदि । १०७. तदियसमए सम्मत्ते असंखेज्जगुणं देदि । १०८. सम्मामिच्छत्ते असंखेज्जगुणं देदि । १०९. एवमं तो मुहुत्तद्धं गुणसंकमो णाम । ११०. तत्तो परमंगुलस्स असंखेज्जदिही मिध्यात्कर्मी उदीरणा होती है । आवली अर्थात् उद्यावलीमात्र प्रथमस्थितिके शेष रह जानेपर मिध्यात्वकर्मके स्थिति अनुभागका उदीरणारूपसे बात नहीं होता है ।। ९८ - १०१ ॥ विशेषार्थ - मिध्यात्वका स्थितिकांडकघात और अनुभागकांडकघात तो प्रथमस्थितिके अन्तिम समय तक संभव है; क्योंकि, चरमस्थितिके वन्धके साथ ही उनकी समाप्ति देखी जाती हैं | इसलिए यहाँ उदीरणाघातका ही निषेध किया गया है, ऐसा जानना चाहिए । ૬૮ चूर्णिसू० - उपर्युक्त विधान से आवलीमात्र अवशिष्ट मिध्यात्वकी प्रथमस्थितिको क्रमसे वेदन करता हुआ उक्त जीव चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टि होता है और तदनन्तर समयमें अर्थात् मिध्यात्वकी सर्व प्रथमस्थितिको गला देनेपर वह दर्शनमोहनीचकर्मका उपशम करके प्रथमोपशमसम्यक्त्वको उत्पन्न करता है । तभी ही वह अर्थात् दर्शनमोहनीय कर्मका उपशमन करनेके प्रथम समय में ही, मिध्यात्वकर्मके मिध्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति नामके तीन कमांश अर्थात् खंड उत्पन्न करता है । प्रथमसमयवर्ती उपशमसम्यग्दृष्टि जीव मिध्यात्वसे प्रदेशाय अर्थात् उदीरणाको प्राप्त कर्म- प्रदेश को लेकर उनका वहु भाग सम्यग्मिध्यात्वमें देता है और उससे असंख्यातगुणित हीन प्रदेशाय सम्यक्त्व प्रकृतिमें देता है । इससे द्वितीय समयमें सम्यक्त्वप्रकृतिने असंख्यातगुणित प्रदेशान देता है । इससे सम्यग्मिथ्यात्वमे असंख्यातगुणित प्रदेशात्र देता है । इससे तीसरे समयमै सम्यक्त्वप्रकृतिमें असंख्यातगुणित प्रदेशाम देता है और इससे भी असंख्यातगुणित प्रदेशाय सम्यग्मिध्यात्वमें देता है । इस प्रकार अन्तर्मुहूर्तकाल तक गुणसंक्रमण होता है । अर्थात् गुणश्रेणीके द्वारा सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिध्यात्वकर्मको गुणसंक्रमणके अन्तिम समय तक पूरि करता है | असंख्यातगुणित क्रमसे कर्म- प्रदेशों के संक्रमणको गुणसंक्रमण कहते हैं । इस १ को एत्य दक्षणमोहणीयत्स उवसमो णाम ! करणपरिणामेहिं णित्तत्तीकयत्स दसणमोहणीयत्स उदयपत्राएण विणा अवट्ठाणमुक्समो त्ति भण्णदे | जयघ २ मिच्छत्त-सभ्मत सम्मामिच्छतसप्णिटा | जयघ० ३ कुदो एवमेदेसिमुप्पत्ती चे ण, अणियट्टिकरणपरिणामेहिं पेरिमाणस्स दंसणमोहणीयत्स जवेण द लिज्जमाणकोद्दवराखित्तेव तिन्ह भेदाणमुप्पत्तीए विरोहाभावादो । नवध० छ ताम्रपत्रबाली प्रतिमें 'पदेस नं' पाठ नहीं है । ( देखो पृ० १७२२ )
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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