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________________ मा० ९४ ] उपशामक - योग्यता- निरूपण ६२१ भागं पडिवज्जइ । ४७. अणुभागवादो अर्णते भागे घादिदूण अनंतभागं पडिवज्जइ । ४८. तदो इस्स चरिमसमय अधापवत्तकरणे वट्टमाणस्स णत्थि द्विदिघादो वा, अणुभागादो वा । से काले दो वि घादा पत्तीहिंति । ४९. एदाओ चत्तारि सुत्तगाहाओ अधापवत्तकरणस्स पडमममए परूविदाओ । ५०. दंसणमोह उवसामगस्स तिविहं करणं । ५१ तं जहा । ५२. अधापवत्तकरणमपुत्रकरणमपिट्टिकरणं च । ५३. चउत्थी उवसामणद्धा । प्रवृत्तकरणके चरम समयमे वर्तमान जीवके न तो स्थितिघात होता है और न अनुभागधात होता है । किन्तु तदनन्तर समयमें अर्थात् अपूर्वकरणके कालमें ये दोनो ही घात प्रारम्भ होगे ॥४५-४८ ॥ चूर्णिसू० - इस प्रकार उक्त चारों सूत्र -गाथाएँ अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयमें प्ररूपित की गईं । दर्शनमोहका उपशमन करनेवाले जीवके तीन प्रकारके करण अर्थात् परिणामविशेष होते हैं । वे इस प्रकार हैं- अधः प्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण । उक्त जीवके चौथी उपशामनाद्धा भी होती है ।। ४९-५३॥ विशेषार्थ - जिन परिणामविशेषोके द्वारा मोहकर्मका उपशम, क्षय या क्षयोपशम किया जाता है उन्हें करण कहते हैं । वे परिणामविशेष तीन प्रकार के होते हैं - अधःप्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण । चूर्णिकार आगे स्वयं ही तीनों करणोका विस्तृत विवेचन करेगे । यहाँ इनका इतना अभिप्राय समझ लेना चाहिए कि जिस भाव में वर्तमान जीवोके उपरितनसमयवर्ती परिणाम अधस्तन समयवर्ती जीवोके साथ संख्या और विशुद्धिकी अपेक्षा सदृश होते है, उन भावोके समुदायको अधः प्रवृत्तकरण कहते है । इस अधःप्रवृत्तकरणका काल अन्तर्मुहूर्त है । अधःप्रवृत्तकरणके कालके संख्यातवें भागप्रमाण अपूर्वकरणका काल है और अपूर्वकरण कालके संख्यातवें भागप्रमाण अनिवृत्तकरणका काल है । इन तीनो परिणामोका समुदायात्मक काल भी अन्तर्मुहूर्त ही है । जिस कालमें प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धिको लिए हुए अपूर्व - अपूर्व परिणाम होते हैं, उन परिणामोको अपूर्वकरण कहते हैं । अपूर्व - करण के विभिन्न समयो में वर्तमान जीवों के परिणाम सदृश नहीं होते, किन्तु विसदृश या असमान और अनन्तगुणी विशुद्धतासे युक्त पाये जाते हैं । अधःप्रवृत्तकरणके परिणाम असख्यात लोकप्रमाण हैं । यद्यपि अधःप्रवृत्तकरण के काल से अपूर्वकरणका काल अल्प है, तथापि परिणामोंके संख्या की अपेक्षा अधःप्रवृत्तकरणके परिणामोसे अपूर्वकरणके परिणाम असंख्यात लोकगुणित होते हैं । अनिवृत्तिकरणके परिणामोकी संख्या उसके कालके समयोके समान है । अर्थात् एक समयवर्ती जीवके एक ही परिणाम पाया जाता है और एक समयवर्ती अनेक जीवोके भी एक सदृश ही परिणाम पाये जाते हैं । एक कालवर्ती जीवोंके परिणामों में निवृत्ति, भेद या विसदृशता नहीं पाई जाती है, इसीलिए उन्हें अनिवृत्तिकरण कहते हैं । चौथी उपशामनाद्धा होती है । अद्धा नाम कालका है, जिस कालविशेप में दर्शनमोहनीय कर्म I
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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