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________________ ६०० कसाय पाहुड सुत्त [८ चतुःस्थान-अर्थाधिकार (२१) एदेसि ठाणाणं चदुसु कसाएसु सोलसण्हं पि । कं केण होइ अहियं द्विदि-अणुभागे पदेसग्गे ॥७४॥ तीक्ष्ण क्षार देकर भट्टीमे पकानेपर और वर्षांतक जलधारामें प्रक्षालन करनेपर भी वह नहीं दूर होता है, अर्थात् वह वस्त्र भले ही सड़-गलकर नष्ट हो जाय, पर उसका रंग कभी नहीं उतरता। यहॉतक कि उस वस्त्रको अग्निसे जला देनेपर भी उसकी भस्म ( राख ) भी उसी वस्रके ही. रंगकी बनी रहती है । इसी प्रकार जो जीवोका हृदयवर्ती लोभपरिणाम अत्यन्त तीव्रतम हो, किसी भी उपायसे छूट न सके, 'चमड़ी चली जाय, पर दमड़ी न जाय,' इस जातिका हो, उस लोभपरिणामको कृमिरागके समान कहा गया है। इससे मन्द अनुभागवाला लोभपरिणाम अक्षमलके समान बतलाया गया है । अक्षनाम रथ, शकट तांगा आदिके चक्र (चक्का, पहिया) का है, उसमे जो सरलतासे घूमनेके लिए काले रंगका गाढ़ा तेल ( ओगन ) लगाया जाता है, उसे अक्षमल कहते है। वह चक्रके परिभ्रमणका निमित्त पाकर और भी चिकना और गाढ़ा हो जाता है । वह यदि किसी वस्त्रके लग जाय, तो उसका दूर होना बड़ा कठिन होता है, अत्यन्त तीक्ष्ण क्षार आदिका निमित्त मिलनेपर ही बहुत दिनोमे वह दूर हो पाता है, इसी प्रकार जो लोभपरिणाम कृभिरागसे तो मन्द अनुभागवाला हो, पर फिर भी सरलतासे शुद्ध न हो सके, उसे अक्षमलके समान लोभ कहा गया है। पांशुनाम धूलिका है । जिस प्रकार पैरोमें लगी हुई धूलि तैल पसीना आदिका निमित्त पाकर यद्यपि जम जाती है, फिर भी वह गर्म जल आदिके द्वारा द्वारा सरलतासे दूर ही जाती है, इसी प्रकार जो लोभ-परिणाम सरलतासे दूर किये जा सके, उन्हे पांशु-लेपके समान कहा गया है । जो लोभ इससे भी मन्द अनुभागवाला होता है, उसे हारिद्र वस्त्रकी उपमा दी गई है । जैसे हरिद्रा ( हलदी ) से रंगा गया वस्त्र देखनेमे तो पीले रंगका मालूम होता है, पर पानीसे धोते ही उसका रंग बहुत शीघ्र सरलतासे छूट जाता है, या धूप आदिके निमित्तसे भी जल्दी उड़ जाता है । इसी प्रकार जो लोभ सरलतासे छूट जाय वहुत कालतक आत्मामे अवस्थित न रहे, अत्यन्त मन्द जातिका हो, उसे हारिद्रवत्रके समान कहा गया है । इस प्रकार अनुभागकी हीनाधिकताके तारतम्यसे लोभके चार भेद कहे गये हैं; ऐसा जानना चाहिए। ___ अब इन ऊपर कहे गये सोलह भेदरूप स्थानोंका अल्पवहुत्व निर्णय करनेके लिए गुणधराचार्य गाथासूत्र कहते हैं इन अनन्तर-निर्दिष्ट चारों कषायों सम्बन्धी सोलहों स्थानोंमें स्थिति, अनुभाग और प्रदेशकी अपेक्षा कौन स्थान किस स्थानसे अधिक होता है, (और कौन किससे कम होता है ) १ ॥७४॥ विशेपार्थ-यह गाथा प्रश्नात्मक है और इसके द्वारा ग्रन्थकारने अल्पबहुत्वसम्बन्धी प्रश्न उठाकर वक्ष्यमाण क्रमसे समाधान करनेके लिए उपक्रम किया है । गाथामे यद्यपि स्थितिकी अपेक्षा भी अल्पवहुत्व करनेका निर्देश किया गया है, तथापि स्थितिकी अपेक्षा अल्पबहुत्व
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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