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________________ गा० ६९] अष्ट-अनुयोगद्वारापेक्षया कषायोपयोग-निरूपण २२४. एवं चउत्थीए गाहाए विहासा समत्ता। २२५. 'केवडिगा उवजुत्तासरिसीसु च वग्गणाकसाएसु' चेति एदिस्से गाहाए अत्थविहासा । २२६. एसा गाहा सूचणासुत्तं । २२७. एदीए सूचिदाणि अट्ठ अणिओगद्दाराणि । २२८. तं जहा । २२९. संतपरूवणा, दव्वपमाणं खेत्तपमाणं फोसणं कालो अंतरं भागाभागो अप्पाबहुअं च । २३०. 'केवडिगा उवजुत्ता' त्ति दव्वपमाणाणुगमो । २३१. 'सरिसीसु च वग्गणाकसाएसु' त्ति कालाणुगमो । २३२. 'केवडिगा च कमाए' त्ति भागाभागो । २३३. के के च विसिस्सदे केणेत्ति' अप्पाबहुअं। २३४. एवमेदाणि चत्तारि अणिओगदाराणि सुत्तणिबद्धाणि । २३५. सेसाणि सूचणाणुमाणेण कायवाणि । गुणित होते है । इससे अजघन्य-अनुत्कृष्ट कषायोदयस्थानमे और अजघन्य-अनुत्कृष्ट क्रोधकषायके उपयोगकालमे जीव विशेष अधिक होते हैं। इससे अजवन्य-अनुत्कृष्ट कपायोदयस्थानमें और अजघन्य-अनुत्कृष्ट मायाकषायके उपयोगकालसे जीव विशेष अधिक होते है । इससे अजघन्य-अनुत्कृष्ट कषायोदयस्थानमे और अजघन्य-अनुत्कृष्ट लोसकपायके उपयोगकालमें जीव विशेष अधिक होते है। इस प्रकारसे ओघकी अपेक्षा परस्थानपद-सम्बन्धी अल्पबहुत्वका निरूपण किया । चूर्णिसू०--इस प्रकार चौथी सूत्रगाथाकी अर्थविभापा समाप्त हुई ॥२२४॥ चूर्णिसू०-अब 'सदृश कषायोपयोग-वर्गणाओमे कितने जीव उपयुक्त है' इस पॉचवीं गाथाकी अर्थविभापा कहते हैं। यह गाथा सूचनासूत्र है, क्योकि, इस गाथासे आठ अनुयोगद्वार सूचित किये गये हैं । वे आठ अनुयोगद्वार इस प्रकार हैं-सत्प्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणाणुगम, क्षेत्रप्रमाणाणुगम, स्पर्शनानुगम, कालानुगम, अन्तरानुगम, भागाभागानुगम और अल्पबहुत्वानुगम । 'कितने जीव उपयुक्त हैं', गाथाके इस प्रथम चरणसे द्रव्यप्रमाणानुगम नामक अनुयोगद्वार सूचित किया गया है। 'सदृश अर्थात् एक कपायसे प्रतिबद्ध कपायोपयोगवर्गणाओमें जीव कितने काल तक उपयुक्त रहते है' गाथाके इस द्वितीय चरणसे कालानुगम नामक अनुयोगद्वार सूचित किया गया है। 'किस कषायमें कषायोपयुक्त सर्व जीवोका कितनेवां भाग उपयुक्त है' गाथाके इस तृतीय चरणसे भागाभागानुगम नामक' अनुयोगद्वार सूचित किया गया है । 'किस-किस विवक्षित कपायसे उपयुक्त जीव किस अविवक्षित कषायसे उपयुक्त जीवोसे विशिष्ट अधिक होते हैं' गाथाके इस अन्तिम चरणसे अल्पबहुत्व अनुयोगद्वार सूचित किया गया है। इसप्रकार द्रव्यप्रमाणानुगम, कालानुगम, भागाभागानुगम और अल्पबहुत्व, ये चार अनुयोगद्वार तो गाथासूत्रमें ही निबद्ध है । शेप अर्थात् सत्प्ररूपणा, क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम और अन्तरानुगम ये चार अनुयोगद्वार सूचनारूप अनुमानसे ग्रहण करना चाहिए ॥२२५-२३५॥ ७४
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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