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________________ कसाय पाहुड सुत्त [७ उपयोग-अर्थाधिकार १४८. जहा णेरइयाणं कोहोवजोगाणं वियप्पा, तहा देवाणं लोभोवजोगाणं वियप्पा । १४९. जहा णेरड्याणं माणोवजोगाणं वियप्पा, तहा देवाणं मायोवजोगाणं वियप्पा । १५०. जहा णेरइयाणं मायोवजोगाणं वियप्पा, तहा देवाणं माणोवजोगाणं वियप्पा । १५१ जहा रहयाणं लोभोवजोगाणं वियप्पा, तहा देवाणं कोहोवजोगाणं वियप्पा । १५२ जेसु णेरड्यभवेसु असंखेज्जा कोहोवजोगा माण-माया-लोभोवजोगा वा जेसु वा संखेज्जा, एदेसिमट्ठण्हं पदाणमप्पाबहुअं । १५३. तत्थ उपसंदरिसणाए करणं । १५४. एक्कम्हि वस्से जत्तियाओ कोहोवजोगद्धाओ तत्तिएण जहण्णासंखेज्जयस्स भागो जं भागलद्धमेत्तियाणि वस्साणि जो भवो तम्हि असंखेज्जाओ कोहोबजोगद्धाओ । चूर्णिसू०-जिस प्रकारसे नारकी जीवोके क्रोधकपायसम्बन्धी उपयोग-वारोके विकल्प कहे गये हैं, उसी प्रकारसे देवोके लोभकषायसम्बन्धी उपयोग-वारोके विकल्प जानना चाहिए। जिस प्रकारसे नारकियोके मानकषायसम्बन्धी उपयोगवारोके विकल्प कहे गये हैं, उसी प्रकारसे देवोके मायाकपायसम्बन्धी उपयोग-वारोके विकल्प जानना चाहिए । जिस प्रकार नारकियोके मायाकपायसम्बन्धी उपयोग-बारोके विकल्प कहे गये हैं, उसी प्रकारसे देवोके मानकषायसम्बन्धी उपयोग-वारोके विकल्प होते हैं। जिस प्रकारसे नारकियोके लोभकपायसम्बन्धी उपयोग-बारोके विकल्प कहे गये हैं, उसी प्रकारसे देवोके क्रोधकपायसम्बन्धी उपयोग वारोके विकल्प होते हैं ॥१४८-१५१।। चूर्णिसू०-नारकी जीवीके जिन भवोमे क्रोध, मान, माया और लोभकपायसम्बन्धी उपयोगोके वार असंख्यात होते हैं, अथवा जिन भवोमे क्रोध, मान, माया और लोभकपायसम्बन्धी उपयोगोके वार संख्यात होते हैं, तत्सम्बन्धी इन आठो पदोका अल्पवहुत्व इस प्रकार है। उनमें से अब इन क्रोधादि कषायोके संख्यात अथवा असंख्यात उपयोग-वारवाले भवोंके विषय-विभाग बतलानेका निर्णय करते है-एक वर्षमें जितने क्रोधकपायके उपयोगकाल-वार होते हैं, उतनेसे जघन्य असंख्यातको भाग देवे। जो भाग लब्ध हो, उतने वर्प-प्रमाण जो भव हैं, उस भवमे क्रोधकपायसम्बन्धी उपयोगकालकं वार असंख्यात होते है ।।१५२-१५४॥ विशेषार्थ-इस सूत्रके द्वारा क्रोधकषायसम्बन्धी संख्यात उपयोगकाल-बार अथवा असंख्यात उपयोगकालवारवाले भवग्रहणोका निर्णय किया गया है। वह इस प्रकार जानना चाहिए-एक अन्तर्मुहूर्त के भीतर यदि क्रोधकपायका एक उपयोगकाल-बार पाया जाता है तो एक वर्षके भीतर कितने क्रोधकपायके उपयोगकाल-वार प्राप्त होगे? इस प्रकार त्रैराशिक करनेसे एक वर्षके भीतर क्रोधके संख्यात सहस्र उपयोगकाल-बार प्राप्त होते है । पुनः इन एक वर्षसम्बन्धी क्रोधके उपयोगकाल-वारोंसे जघन्य असंख्यातका भाग करना चाहिए । अर्थात् यदि १ किमुवसंदरिसणाकरण णाम ? उवसंदरिसणाकरण णिदरिसणकरण णिण्णयकरणमिदि एवछो । जयघ01
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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