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________________ ५६२ कसाय पाहुड सुत्त [७ उपयोग-अर्थाधिकार साहिया । १३. मायद्धा जहणिया विसेसाहिया । १४. लोभद्धा जहणिया विसेसाहिया । १५. माणद्धा उक्कस्सिया संखेजगुणा । १६. कोधद्धा उक्कस्सिया विसेसाहिया । १७. मायद्धा उक्कस्सिया विसेसाहिया । १८. लोभद्धा उक्कस्सिया विसेसाहिया १९. पवाइन्जंतेण उवदेसेण अद्धाणं विसेसो अंतोमुहत्तं । २०. तेणेव उवदेसेण चउगइसमासेण अप्पाबहुअं भणिहिदि । २१. चदुगदिसमासेण जहण्णुक्कस्सपदेसेण णिरयगदीए जहणिया लोभद्धा थोवा । २२. देवगदीए जहणिया कोधद्धा विसेहै । माया कषायका जघन्यकाल क्रोधकषायके जघन्यकालसे विशेष अधिक है। लोभकपायका जघन्यकाल मायाकषायके जघन्यकालसे विशेष अधिक है ॥१२-१४॥ चूर्णिसू०-मानकषायका उत्कृष्टकाल लोभकषायके जघन्यकालसे संख्यातगुणा है । क्रोधकषायका उत्कृष्टकाल मानकपायके उत्कृष्टकालसे विशेष अधिक है। मायाकपायका उत्कृष्टकाल क्रोधकघायके उत्कृष्टकालसे विशेष अधिक है। लोभकषायका उत्कृष्टकाल मायाकषायके उत्कृष्टकालसे विशेष अधिक है ॥१५-१८॥ ___ चूर्णिसू०-प्रवाह्यमान उपदेशकी अपेक्षा क्रोधादि कपायोके कालकी विशेषता अन्तर्मुहूर्त है । ॥१९॥ विशेपार्थ-ऊपर जो ओघकी अपेक्षा कषायोका काल-सम्बन्धी अल्पवहुत्व बतलाया गया है, वह जिस जिस स्थानपर विशेष अधिक कहा गया है, वहाँ वहाँ पर विशेप अधिकसे अन्तर्मुहूर्तकालकी अधिकता समझना चाहिए। वह अन्तर्मुहूर्त यद्यपि अनेक भेदरूप है, कोई संख्यात आवलीप्रमाण, कोई आवलीके संख्यातवे भागप्रमाण और कोई आवलीके असंख्यातवे भागप्रमाण होता है। किन्तु यहाँ पर प्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार आवलीके असंख्यातवे भागमात्र ही विशेष अधिक काल समझना चाहिए । जो उपदेश सर्व आचार्योंसे सम्मत है, चिरकालसे अविच्छिन्न सम्प्रदाय-द्वारा प्रवाहरूपसे आ रहा है, और गुरु-शिष्य-परम्पराके द्वारा प्ररूपित किया जाता है, वह प्रवाह्यमान उपदेश कहलाता है । इससे भिन्न जो सर्व आचार्य-सम्मत न हो और अविच्छिन्न गुरु-शिष्य-परम्परासे नहीं आ रहा हो, ऐसे उपदेशको अप्रवाह्यमान उपदेश कहते हैं। अथवा आर्यमंक्षु आचार्यके उपदेशको अप्रवाह्यमान और नागहस्ति क्षमाश्रमणके उपदेशको प्रवाह्यमान उपदेश समझना चाहिए। चूर्णिस०-उसी प्रवाह्यमान उपदेशकी अपेक्षा अव चारो गतियोका समुच्चय आश्रय करके कपायोके काल-सम्बन्धी अल्पवहुत्वको कहते है-चतुर्गतिके समाससे जघन्य और उकृष्ट पदकी अपेक्षा नरकगतिमें लोभकपायका जघन्यकाल सबसे कम है । (क्योकि द्वेष-बहुल नारकियोमे जाति-विशेपसे ही प्रेयरूप लोभपरिणामका चिरकाल तक रहना अस १ को वुण पवाइजतोवएसो णाम वुत्तमेद १ सव्वाइरियसम्मदो चिरकाल्मव्वोच्छिण्णसग्दायकमेणागच्छमाणो नो सित्सपरपराए पवाइनदे पण्णविजदे सो पवाइजतावएसो ति भण्णदे । अथवा अज्जमखुभयवंताणमुवएसो एत्थापवाइजमाणो णाम । णागहत्थिखवणाणमुवएसो पवाइजतओ ति घेत्तव्यो । जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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