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________________ ५५४ कसाय पाहुड सुत्त [ ६ वेदक अर्थाधिकार ६५८ लोहसंजलस्म वि एसो चेव आलावो । णवरि अत्थेण णाणत्तं', वंजणदो ण किंचि जाणत्तमस्थि । ६५९ इत्थि-णQमयवेद अरइ सोगाणं जहणिया पदेसुदीरणा थोवा। ६६०. संकयो असंखेज्जगुणो । ६६१. बंधो असंखेज्जगुणो । ६६२. उदयो असंखेज्जगणो । ६६३ संतकम्ममसंखेज्जगुणं । व्याख्यान करना चाहिए । अर्थात् क्रोधसंज्वलनकी अपेक्षा मानसंज्वलनादि प्रकृतियोके अल्पवहुत्वमे शव्दगत या अर्थगत कोई भी भेद नहीं है । लोभसंचलनका भी यही आलाप है, अर्थात् प्रदेशसम्बन्धी अल्पवहुत्वका क्रम है, परन्तु उसमे अर्थकी अपेक्षा विभिन्नता है, व्यंजन ( शब्द ) की अपेक्षा कोई विभिन्नता नहीं है ॥६५७-६५८॥ विशेषार्थ-संज्वलन लोभकी जघन्य प्रदेश-उदीरणा अल्प है, उससे उदय, संक्रम और सत्कर्म उत्तरोत्तर असंख्यातगुणित हैं, इस प्रकारसे यद्यपि अल्पबहुत्वमे शब्दगत कोई विभिन्नता नहीं है, तथापि अर्थगत विभिन्नता है। और वह इस प्रकार है कि संक्रमगत द्रव्यसे यहॉपर क्षपितकौशिक लक्षणसे आकरके क्षपणाके लिए उद्यत हुए और अपूर्वकरणकी आवलीके चरम समयमे वर्तमान जीवके अधःप्रवृत्तसंक्रमगत जघन्य द्रव्यका ग्रहण करना चाहिए । यहॉपर गुणकारका प्रमाण पल्योपमका असंख्यातवॉ भाग या पल्योपमके असंख्यात प्रथम वर्गमूल है । लोभसंज्वलनके जघन्य संक्रमसे उसका सत्कर्म असंख्यातगुणित है । यहॉपर उसी उपयुक्त जीवके अधःप्रवृत्तकरणके चरम समयमे द्वयर्धगुणहानिप्रमित एकेन्द्रियके योग्य समयप्रवद्धोका ग्रहण करना चाहिए। यहॉपर गुणकारका प्रमाण अधःप्रवृत्तभागहार है । इस अर्थगत विशेषताका चूर्णिकारने उक्त सूत्रमे संकेत किया है। चूर्णिम०-स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, अरति और शोक, इन प्रकृतियोकी जघन्य प्रदेशउदीरणा वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम होती है। इनकी प्रदेश-उदीरणासे उनका संक्रम असंख्यातगुणा होता है । उनके संक्रमसे उनका वन्ध असंख्यातगुणा होता है । उनके वन्धसे उनका उदय असंख्यातगुणा होता है और उनके उदयसे उनका सत्कर्म असंख्यातगुणा होता है ॥६५९.६६३॥ १ को वुण सो अस्थगओ विसेमो चे? जहण्णसकम सतकम्मेसु दध्वगओ विसेसो त्ति भणामो | त जहा-लोहसजलण-जहण्णपदेसुदीरणा थोबा, उदयो असखेजगुणो। एत्थ पुव्व व गुणगारो वत्तव्बो विसेसा भावादो । सकमो असखेल गुणो | कुदो, खविदकम्मसियलक्खणेणागतूण खवणाए अन्भुहिदस्स अपुव्वकरणावलिय चरिमसमए वट्टमाणस्स अधापवत्तसकम-जहण्णदव्यग्रहणादो। को गुणगारो? पलिदोवमस्स असखेजदिभागो अमुखेजाणि पलिदोवमपढमवग्गमलाणि । सतकम्ममसखेजगुण | कुदो खविदकम्मसियलक्खणेणागतूण खवगसेढि चढणुम्मुहस्स अधापवनकरणचरिमसमर दिवडढगणहाणिमेत इदियसमयपबद्धे घेत्तण जहण्णसामित्तविहाणादो। एत्थ गुणगारो अधापवत्तभागहारो। एवमेसो अत्यविसेसो एत्य जाणेयन्वो । जयघ० २ कि पमाणमेद दव्व ? असखेजलोगपडिभागिय-मिच्छाइट्ठि-उदीरिददव्यमेत । तदो सम्वत्योवत्तमेदस्सण विरुण्झदे। जयघ० ३ किं कारण; अप्पप्पणा पाओग्गखविदकम्मसियलक्खणोणागनूण खत्रणाए अन्मुट्टिदत्स अधा. पवत्तकरणचरिमसमये विझादमकमेण जहाणसामित्तपडिलमाटो| जयध० ४ किं कारण; सुहमणिगोटजहण्योववादनोगेण वदसम्यपवद्धपमाणत्तादो। जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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