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________________ गा० ६२] प्रदेशापेक्षया बन्धादि-पंचपद-अल्पबहुत्व-निरूपण ५४९ च अणंतगुणाणि। ६०९. अरदि-सोगाणं जहण्णगो अणुभाग-उदयो उदीरणा च थोवाणि । -६१०. जहण्णगो अणुभागवंधो अणंतगुणो। ६११. जहण्णाणुभागसंकमो संतकम्म च अणंतगुणाणि । अणुभागविसयमप्पाबहुअं समत्तं । ६१२. पदेसेहिं उक्कस्समुक्कस्सेण । ६१३. मिच्छत्त-चारसकसाय-छण्णोकसायाणमुक्कस्सिया पदेसुदीरणा थोवा । ६१४. उक्कस्सगो बंधो असंखेज्जगुणो । ६१५. उक्कस्सपदेसुदयो असंखेज्जगुणो । ६१६. उक्कस्सपदेससंकमो असंखेज्जगुणो । ६१७. उन्हींका जघन्य अनुभाग-संक्रम और जघन्य अनुभाग-सत्कर्म अनन्तगुणित है॥६०६-६०८॥ चूर्णिसू०-अरति और शोकका जघन्य अनुभाग-उदय और जघन्य अनुभागउदीरणा वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम है। उक्त प्रकृतियोके जघन्य अनुभाग-उदयसे उन्हींका जघन्य अनुभागबन्ध अनन्तगुणा है । अरति-शोकके जघन्य अनुभागबन्धसे उन्हीका जघन्य अनुभाग-संक्रम और जघन्य अनुभाग-सत्कर्म अनन्तगुणित है ॥६०९-६११॥ इस प्रकार अनुभाग-विषयक अल्पबहुत्व समाप्त हुआ। चूर्णिसू०-अब प्रदेशोकी अपेक्षा अल्पबहुत्व कहेगे। उनमे पहले प्रदेशवन्धादि पाँचो पदोंके उत्कृष्टका उत्कृष्टके साथ कहते है-मिथ्यात्व, अनन्तानुवन्धी आदि बारह कपाय 'और हास्यादि छह नोकषायोकी उत्कृष्ट प्रदेश-उदीरणा वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम है। मिथ्यात्वादि उक्त प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट प्रदेश-उदीरणासे उन्हींका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध असंख्यातगुणा है। मिथ्यात्वादि सूत्रोक्त प्रकृतियोके उत्कृष्ट प्रदेशबन्धसे उन्हीका उत्कृष्ट प्रदेश‘उदय असंख्यातगुणा है । मिथ्यात्वादिके उत्कृष्ट प्रदेश-उदयसे उन्हीका उत्कृष्ट प्रदेश-संक्रम १ किं कारण, खवगसेढिम्मि चरिमाणुभागखडयचरिमफालीए सव्वघादि-विट्ठाणियसरूवाए पयदजहण्णसामिचोवलभादो । जयध० २ किं कारण; अपुवकरणचरिमसमयम्मि देसघादि-विठ्ठाणियसरूवेण तदुभयसामित्वावलंबणादों। जयव० ३ किं कारण, पमत्तसजदतप्पाओग्गविसोहीए बद्धदेसघादिविट्ठाणियमरूवणवकवधावलबणेण पयदजहण्णसामिचविहासणादो । जयध० ४ कुदो, सव्वघादिविट्ठाणियचरिमफालिविसयत्तण पडिलद्ध जहण्णभावत्तादो । जयध० ५ कुदो; अप्पप्पणो सामित्तविसये उक्कस्सविसोहीए उदीरिजमाणासखेजलोगपडिभागियदव्वस्स गहणादो । जयध० ६ कुदो, सण्णिपचिदियपजत्तणुक्कस्सजोगिणा बज्झमाणुक्कस्सस्स समयपबद्धस्स अणूणाहियस्स गहणादो । जयघ० ७ कुदो, असखेजसमयपबद्धपमाणत्तादो । जयध० .८ किं कारण, किचूणसग-सगुक्कस्सदव्वपमाणत्तादो । जयध० .
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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