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कसाय पाहुड सुत्त [ ६ वेदक-अर्थाधिकार __५९९. इस्थि-णबुंसयवेदाणं जहण्णगो अणुभाग-उदयो संतकम्मं च थोवाणि । ६००. जहणिया अणुभाग-उदीरणा अणंतगुणा'। ६०१. जहण्णगो अणुभागवंधो अणंतगुणो । ६०२. जहण्णगो अणुभागसंकमो अणंतगुणों ।।
६०३. पुरिसवेदस्स जहण्णगो अणुभागवंधो संकमो संतकम्मं च थोवाणि । ६०४. जहण्णगो अणुभाग-उदयो अणंतगुणो । ६०५. जहणिया अणुभाग-उदीरणा अणंतगुणा।
६०६. हस्स-रदि-भय-दुगुछाणं जहण्णाणुभागवंधो थोवो । ६०७. जहण्णगो अणुभाग-उदयो उदीरणा च अणंतगुणो । ६०८. जहण्णगो अणुभागसंकमो संतकम्म
चूर्णिसू०-खी और नपुंसक वेदका जघन्य अनुभाग-उदय और जघन्य अनुभागसत्कर्म वक्ष्यमाण पदोंकी अपेक्षा सबसे कम है । स्त्री और नपुंसक वेदके जघन्य अनुभागउदयसे उन्हींकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा अनन्तगुणी है। स्त्री और नपुंसक वेदकी जघन्य अनुभाग-उदीरणासे उन्हीका जघन्य अनुभाग-बन्ध अनन्तगुणा है। स्त्री और नपुंसकवेदके जघन्य अनुभागबन्धसे उन्हींका जघन्य अनुभागसंक्रम अनन्तगुणा है ॥५९९-६०२।।
चूर्णिसू०-पुरुषवेदका जघन्य अनुभागबन्ध, जघन्य अनुभाग संक्रम और जघन्य अनुभाग-सत्कर्म वक्ष्यमाण पदोंकी अपेक्षा सबसे कम है। पुरुपवेदके जघन्य अनुभाग बन्ध आदिसे उसीका जघन्य अनुभाग-उदय अनन्तगुणा है। पुरुषवेदके जघन्य अनुभाग-उदयसे उसीकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा अनन्तगुणी है ॥६०३-६०५॥
चूर्णिस०-हास्य, रति, भय और जुगुप्साका जघन्य अनुभागवन्ध वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम है। उक्त प्रकृतियोके जघन्य अनुभागवन्धसे उन्हींका जघन्य अनुभागउदय और जघन्य अनुभागउदीरणा अनन्तगुणी है । उक्त प्रकृतियोके जघन्य अनुभाग-उदयसे
१ कुदो; देसघादिएगछाणियसरूवत्तादो | जयध०
२ एसा वि देसघादिएगट्ठाणियसरूवा चेय, किंतु हेट्ठा समयाहियावलियमेत्तो ओसरियूण जहण्णा जादा । तदो उवरिमावलियमेत्तकालमपत्तघादत्तादो एमा अणतगुणा त्ति सिद्ध । जयध°
३ किं कारण; विटाणियसरूवत्तादो । जयध०
४ जहण्णसकमो णाम अंतरकरणे कदे सुहुमेइ दियजहण्णाणुभागसतकम्मादो हेट्ठा अणतगुणहीणो होदूण पुणो वि सखेजसहस्साणुभागखडएसु घादिदेसु चरिमफालिसरूवेण जहण्णो जादो । एव विद्दघाद पत्तो वि चिराणसतकम्म होदूण पुन्बुत्तबधादो सकमाणुभागो अणतगुणो जादो । जयध०
५ कुदो; चरिमसमयसवेढजहण्णाणुभागवध देसघादिएयट्ठाणियसरुव घेत्तृण तिण्हमेदेमि जहष्णसामित्तावलंबणादो । जयध०
६ कुदो; देसघादिएवट छाणियत्ताविसेसे वि सपहि-बंधादो उदयो अणतगुणो ति णायमस्सियूण पुन्विल्लाणुभागादो एदत्स तहाभावसिद्धीए णिन्वाहमुवलभादो। जयघ०
७ एसा वि देसयादिएयट्ठाणियसरुवा चेय; किंतु समयाहियावलियमेत हेट्ठा ओमरियण जहण्णा जादा; तेण पुविल्लादो एदिस्से अणतगुणत्त ण विरुज्झदे । जयव०
८ कुदो अपुवकरणचरिमसमयणवकबधत्स देसघादिविट्ठाणियमस्वत्स गहणादो | जयध
९ कुदो एदेसि पि तत्थेव जहण्णसामिचे सते वि संपाहिबधादो मपहि-उदयम्माणतगुणत्तमस्सियूण तहाभावसिद्धीदो । जयघ०