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________________ गा० ६२] स्थित्यपेक्षया वन्धादि-पंचपद-अल्पवहुत्व-निरूपण ५३५ ५१४. उदीरिजंति संकामिजंति च विसेसाहियाओ । ५१५. उदिण्णाओ विसेसाहियाओ। ५१६. संतकम्मं विसेसाहियं । ५१७ एवं सोलसकसायाणं । ५१८. सम्मत्तस्स उक्कस्सेण जाओ द्विदीओ संकामिज्जति उदीरिज्जति च चूर्णिस०-जो स्थितियाँ मिथ्यात्वकी उत्कर्पसे उदीरणाको प्राप्त होती हैं और संक्रमणको प्राप्त होती है, वे परस्परमें समान होकर भी मिथ्यात्वकी बंधनेवाली स्थितियोसे विशेप अधिक है ।।५१४॥ विशेषार्थ-इनका प्रमाण बंधावलीसे कम सत्तर कोडाकोड़ी सागरोपम है । चूर्णिमू०-मिथ्यात्वकी उदीरणा और संक्रमणको प्राप्त होनेवाली स्थितियोसे उदयको प्राप्त होनेवाली स्थितियाँ विशेष अधिक है ।।५१५।। विशेषार्थ-क्योकि, उदीयमाण सर्व स्थितियाँ तो उदयको प्राप्त होती ही है, किन्तु तत्काल वेद्यमान उदय-स्थिति भी इसमें सम्मिलित हो जाती है, अतः यहॉपर एक स्थितिमात्रसे अधिक विशेष जानना चाहिए। चूर्णिसू०-मिथ्यात्वकी उदयको प्राप्त होनेवाली स्थितियोसे उसका सत्कर्म विशेष अधिक है ॥५१६॥ विशेषार्थ-क्योकि, सत्कर्मका प्रमाण पूरा सत्तर कोड़ाकोड़ी सागरोपम है । यहॉपर एक समय कम दो आवली प्रमाणकाल विशेष अधिक है। इसका कारण यह है कि वंधावलीके साथ समयोन उदयावलीका यहॉपर प्रवेश देखा जाता है। चूर्णिसू०-इसी प्रकार अनन्तानुबन्धी आदि सोलह कषायोका भी अल्पबहुत्व जानना चाहिए ॥५१७।। विशेषार्थ-कषायोकी स्थिति-आदिका अल्पबहुत्व कहते समय सत्तर कोड़ाकोड़ी सागरोपमके स्थानपर चालीस कोडाकोड़ी सागरोपम कहना चाहिए। " चूर्णिसू०-सम्यक्त्वप्रकृतिकी उत्कर्षसे जितनी स्थितियाँ संक्रमणको प्राप्त होती है और उदीरणाको प्राप्त होती है, वे परस्परमे समान होकर भी वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम है ।।५१८॥ विशेषार्थ-क्योकि, उसका प्रमाण एक अन्तर्मुहूर्त और आवलीसे कम सत्तर कोड़ाकोड़ी सागरोपम है। १ कुदो एदासिं विसेसाहियत्त १ बंधावलियाए उदयावलियाए च ऊणसत्तरिसागरोवमकोडाकोडिपमाणत्तादो । जयध० २.त कथ ? उदीरिजमाणट्ठिदीओ सव्वाओ चेव उदिण्णाओ । पुणो तत्कालवेदिजमाणउदयट्टिदी वि उदिष्णा होइ, पत्तोदयकालत्तादो । तदो एगछिदिमेत्तण विसेसाहियत्तमेत्थ घेत्तव्य । ३ कुदो, सपुण्णसत्तरिसागरोवमकोडाकोडिपमाणत्तादो । केत्तियमेत्तो विसेसो १ समयूणदोआवलियमेत्तो, बधावलियाए सह समयूणुदयावलियाए एत्य पवेसुवलभादो । जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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