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________________ ५२६ ४५५. सेसेहिं कस्मेहिं अणुमग्गियूण दव्वं । ४५६. णाणाजीवेहि भंगविचयो भागाभागो परिमाणं खेत्तं पोसणं कालो अंतरं च एदाणि भाणिदव्वाणि । कसाय पाहुड लुप्त [ ६ वेदक- अर्थाधिकार ४५७. तदो सण्णियासो । ४५८. मिच्छत्तस्स उक्कस्सपदे सुदीरगो अनंताणुवंधीणमुक्कस्सं वा अणुक्कस्तं वा उदीरेदि । ४५९. उक्कस्सादो अणुक्कस्सा चउपदा' । ४६०. एवं दव्वं । चूर्णिसू० - इसी प्रकार शेप कर्मोंकी अपेक्षा अनुमार्गणकर अन्तरकाल जानना चाहिए ||४५५|| चूर्णिसू० ० - नाना जीवोकी अपेक्षा भंगविचय, भागाभाग, परिमाण, क्षेत्र, स्पर्शन, काल और अन्तर, इन अनुयोगद्वारोका व्याख्यान करना चाहिए || ४५६॥ विशेषार्थ - चूर्णिकारने सुगम समझकर इन अनुयोगद्वारोका व्याख्यान नहीं किया है । अतः विशेष जिज्ञासु जनोको जयधवला टीकासे जानना चाहिए । चूर्णिसू० ० - उक्त अनुयोगद्वारोके पश्चात् अब सन्निकर्ष नामक अनुयोगद्वार कहते हैंमिध्यात्वकी उत्कृष्ट प्रदेश - उदीरणाका करनेवाला जीव अनन्तानुबन्धी कषायोकी उत्कृष्ट प्रदेशउदीरणा भी करता है और अनुत्कृट प्रदेश - उदीरणा भी करता है ||४५७-४५८।। अनन्तानुवन्धीकी अनुत्कृष्ट प्रदेश - उदीरणा कितने विकल्परूप करता है ? ऐसा प्रश्न होनेपर आचार्य उत्तर सूत्र कहते हैंचूर्णिसू० - उत्कृष्टसे अनुत्कृष्ट प्रदेश उदीरणा चतुःस्थान - पतित होती है । अर्थात् असंख्यात भागहीन, संख्यात भागहीन, संख्यातगुणहीन और असंख्यातगुणहीन प्रदेशोकी उदीरणा करता है ॥ ४५९॥ I इसी वीजपदके द्वारा शेष कर्मोंकी प्रदेश उदीरणाका सन्निकर्ष भी जान लेना चाहिए, ऐसा बतलाने के लिए आचार्य उत्तर सूत्र कहते हैं चूर्णिसू० - इसी प्रकार शेप कर्मों का भी सन्निकर्ष जानना चाहिए || ४६० ॥ विशेषार्थ - जिस प्रकार मिध्यात्वका अनन्तानुवन्धी के साथ सन्निकर्षका निरूपण किया परिणदेकस्सपदेसुद रणाए कदाए आदी दिट्ठा। तदो संजमं गतूणतरिय सव्वजहणतो मुहुत्ते पुणो मिच्छत्त पडिवजिय जहणंतराविरोहेण विसोहिमावृरिय संजमा हिमुहो होटूण मिच्छाइट्ठिचरिमसमए उकस्सपदेसुदीरगो जादो । लद्वमतर | जयव० १ मिच्छत्तस्म उक्कस्मपदेसुदीरगो णाम सजमा हिमुद्दचरिमसमयमिच्छाइटी सव्यविमुढो सो अताणुवंघीणमण्णदरस्म णियमा एवमुदीरेमाणो उक्त्स वा अणुक्कसं वा उदीरेदि; सामित्तभेदाभावे पि अप्पणी विसेसपच्चयमस्तियूण तहाभावसिद्धीए विरोहाभावादी । जयध० २ कुदो; मिच्छत्तु कस्सपदेसुदीरगत्माणंताणुबंधीणं चउट्ठाणपदिपदेसुदीरणाकारणपरिणामाण पि संभवे विरोहाभावादो । तदो मिच्छत्तक्कस्सपदेनुदीरगो अणंताणुत्रंचीणमणुवत्समुदीरेमाणो असखेजभागहीणं संखेन भागणं सखेनगुणहीणं असखेजगुणहीणमुदोरेदित्ति सिद्ध । जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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