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________________ ५१८ कसाय पाहुड सुत्त [६ वेदक-अर्थाधिकार णावरणजहण्णाणुभागुदीरणा अण्णदरा अणंतगुणा' । ३७८. सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागुदीरणा अणंतगुणा । ३७९. अणंताणुवंधीणं जहण्णाणुभागउदीरणा अण्णदरा अणंतगुणा । ३८०. मिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागुदीरणा अणंतगुणा । ३८१. एवं देवगदीए वि । ३८२. भुजगारउदीरणा उवरिमगाहाए परूविहिदि । पदणिक्खेवो वि तत्थे । वड्डी वि तत्थेव । तदो 'को व के य अणुभागे' त्ति पदस्स अत्थो समत्तो । ३८३. पदेसुदीरणा दुविहा-मूलपयडिपदेसुदीरणा उत्तरपयडिपदेसुदीरणा च । अनुभाग-उदीरणा अप्रत्याख्यानावरणीय किसी एक कषायकी जघन्य अनुभाग-उदीरणासे अनन्तगुणी है । सम्यग्मिथ्यात्वकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा प्रत्याख्यानावरणीय किसी एक कषायकी जघन्य अनुभाग-उदीरणासे अनन्तगुणी है । अनन्तानुबन्धीचतुष्कमेसे किसी एक कपायकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा सम्यग्मिथ्यात्वकी जघन्य अनुभाग-उदीरणासे अनन्तगुणी है। मिथ्यात्वकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा अनन्तानुवन्धी किसी एक कषायकी जघन्य अनुभाग-उदीरणासे अनन्तगुणी है ॥३६७-३८०॥ इस प्रकार नरकगतिमे ओघकी अपेक्षा जघन्य अनुभाग-उदीरणा कही। चूर्णिसू०-इसी प्रकार नारक-ओघालापके समान देवगतिमे भी जघन्य अनुभागउदीरणा-सम्बन्धी अल्पबहुत्वका आलाप (कथन) है । जो थोड़ी बहुत विशेषता है, वह स्वयं आगमसे जानना चाहिए ॥३८१॥ इस प्रकार अल्पवहुत्वके समाप्त होनेपर उत्तरप्रकृतिअनुभाग-उदीरणाका वर्णन समाप्त हुआ। अब भुजाकारादि उदीरणाका वर्णन क्रम-प्राप्त है, अतः उसका वर्णन करनेके लिए चूर्णिकार उत्तरसूत्र कहते है चूर्णिसू०-भुजाकार-उदीरणा उपरिम अर्थात् आगे कही जानेवाली 'बहुदरगं बहुदरगं से काले को णु थोवदरगं वा' इस गाथामे प्ररूपण की जायगी । पदनिक्षेप भी वहींपर कहा जायगा और वृद्धि भी उसी गाथामे कही जायगी ।।३८२॥ इस प्रकार 'को व के य अणुभागे' मूलगाथाके इस पदका अर्थ समाप्त हुआ। अव प्रदेश-उदीरणाका वर्णन किया जाता है चूर्णिसू०-प्रदेश-उदीरणा दो प्रकारकी है-मूलप्रकृतिप्रदेश-उदीरणा और उत्तरप्रकृति १ कुदो, दोण्हमेदेसि सामित्तभेदाभावे वि देस-सयलसंजमपडिबधित्तमस्सियूण तहाभावसिद्धीए णिप्पडिवंधमुवलभादो | जयध० २ कुदोः सव्वघादिविट्ठाणियत्ताविसेसे वि सम्माइट्ठिविसोहीदो सम्मामिच्छाइट्ठिविसोहीए अणंतगुणहीणत्तमस्सियूण तहाभावोवलभादो । जयध० विसोहीदो अर्णतगणहीणमिच्छाइटिटविसोहीए जहणसामित्तपडि लंभादो। जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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