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________________ ४२७ गा० ६२] उदीरणास्थान-अल्पबहुत्व-निरूपण २०५. दोण्हं पवेसगा संखेज्जगुणा' । २०६. एकिस्से पवेसगा संखेज्जगुणा । २०७. तेरसहं पवेसगा संखेज्जगुणा । २०८. तेवीसाए पवेसगा संखेज्जगुणा । २०९. वावीसाए पवेसगा असंखेज्जगुणा । २१०. पणुवीसाए पवेसगा असंखेज्जगुणा । २११. सत्तावीसाए पवेसगा असंखेज्जगुणा । २१२. एकवीसाए पसगा असंखेज्जगुणा । २१३. चउवीसाए पवेसगा असंखेज्जगुणा । २१४. अट्ठावीसाए विशेपार्थ-उक्त इन सभी प्रवेश-स्थानोंका संचय-काल उत्तरोत्तर विशेष अधिक होनेसे जीवोकी संख्या भी विशेष-विशेष अधिक बतलाई गई है। चूर्णिसू०-बीस प्रकृतियोंके प्रवेशक जीवोसे दो प्रकृतियोंके प्रवेश करनेवाले जीव संख्यातगुणित है। दो प्रकृतियोके प्रवेशक जीवोसे एक प्रकृतिके प्रवेश करनेवाले जीव संख्यातगुणित हैं । एक प्रकृतिके प्रवेशक जीवोसे तेरह प्रकृतियोके प्रवेश करनेवाले जीव संख्यातगुणित हैं । तेरह प्रकृतियोके प्रवेशक जीवोसे तेईस प्रकृतियोके प्रवेश करनेवाले जीव संख्यातगुणित हैं ॥२०५-२०८॥ विशेषार्थ-उक्त प्रवेशस्थानोंका संचय काल उत्तरोत्तर संख्यातगुणित है, अतः उनमें प्रवेश करनेवाले जीवोंकी संख्या भी उत्तरोत्तर संख्यातगुणित बतलाई गई है। चूर्णिसू०-तेईस प्रकृतियोके प्रवेशक जीवोसे बाईस प्रकृतियोंके प्रवेश करनेवाले जीव असंख्यातगुणित हैं। वाईस प्रकृतियोके प्रवेशक जीवोसे पच्चीस प्रकृतियोके प्रवेश करनेवाले जीव असंख्यातगुणित हैं। पच्चीस प्रकृतियोके प्रवेशक जीवोसे सत्ताईस प्रकृतियोके प्रवेश करनेवाले जीव असंख्यातगुणित हैं । सत्ताईस प्रकृतियोके प्रवेशक जीवोसे इक्कीस प्रकृतियोके प्रवेश करनेवाले जीव असंख्यातगुणित है। इक्कीस प्रकृतियोके प्रवेशक जीवोसे चौवीस प्रकृतियोके प्रवेश करनेवाले जीव असंख्यातगुणित हैं। चौवीस प्रकृतियोके प्रवेशक जीवोसे अट्ठाईस प्रकृतियोके प्रवेश करनेवाले जीव असंख्यातगुणित हैं ॥२०९-२१४॥ १ केण कारणेण ? पुरिसवेदोदएण खवगसेडिमारूढस अतरकरणादो समयूणावलियागदाए तदोप्पहुडि जाव पुरिसवेदपढमटिठदिचरिमसमयो त्ति ताव एदम्मि कालविसेसे पयदसचयावलबणादो। जइवि उवसमसेढीए चेव पयदसचयो अवलविजदे, तो वि पुटिवल्लदो एदस्स सचयकालमाहप्पेण सखेजगुणत्त २ कुदो, पुग्विल्लादो एदस्त संचयकालमाहप्पदसणादो । जयध० . . ३ किं कारण, अट्ठकसाएमु खविदेसु तत्तोप्पहुडि जाव अतरकरण समाणिय समयूणावलियमेत्तो कालो गच्छदि ताव एदम्मि काले पुव्विल्लकालादो सखेजगुणो तेरसपवेसगाण सचयावलबणादो। जयध० ४ कुदो; दसणमोहक्खवणाए अन्मुट्ठिदेण मिच्छत्ते खविदे तत्तोप्पहुडि जाव सम्मामिच्छत्तक्खवणचरिमसमयो त्ति ताव एदम्मि काले पुन्विल्लकालादो सखेजगुणे सचिदजीवाण गहणादो । जयध० ५ कुदो पलिदोवमस्सासखेजभागपमाणत्तादो । जयध० ६ कुदो; अणताणुब धिविसजोयणाविरहिदाणमुवसमसम्माइट्ठीण सासणसम्माइट्ठीण च अंतोमुहुत्त ७ कुदो; सम्मत्ते उद्वेल्लिदे पुणो पलिदोवमासखेज्जभागपमाणसम्मामिच्छत्तुव्वेल्लणाकालभतरे पयदसचयावलबणादो। जयध० ८ कुदो; चउवीससतकम्सियवेदयसम्माठिरासिस्स गहणादो । जयघ० ण विरुज्झदे । जयध० २ सचिदाणमिहग्गहणादो | जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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