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________________ ४७९ गा० ६२] वेदक-भुजाकार-काल-निरूपण ९३. अप्पदरपवेसगो केवचिरं कालादो होदि ? ९४. जहण्णेण एयसमओ'। ९५. उक्कस्सेण तिण्णि समया । ९६. अवहिदपवेसगो केवचिरं कालादो होदि ? ९७. जहण्णेण एगसमओ । ९८. उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं । ९९. अवत्तव्यपवेसगो केवचिरं कालादो होदि ? १००. जहण्णुकस्सेण एयसमयो । तदनन्तर ही जुगुप्साकी उदीरणा करनेपर चतुर्थ वार भुजाकार उदीरक हुआ। इस प्रकार भी भुजाकार उदीरकका चार समयप्रमाण उत्कृष्ट काल सिद्ध हो जाता है । शंका-अल्पतर-उदीरकका कितना काल है ? ॥९३॥ समाधान-जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल तीन समय है ॥९४-९५॥ विशेषार्थ-किसी संयत या असंयतके विवक्षित अल्पतर प्रकृतिरूप उदीरणास्थानकी उदीरणा करनेके अनन्तर समयमे ही उससे अधिक या कम प्रकृतिरूप उदीरणास्थानकी उदीरणा करनेपर एक समय जघन्यकाल सिद्ध होता है । उत्कृष्टकालकी प्ररूपणा इस प्रकार है-दश प्रकृतियोकी उदीरणा करनेवाले मिथ्यादृष्टिके भयके विना नौ प्रकृतियोकी उदीरणा करनेपर एक समय, तदनन्तर समयमे जुगुप्साके विना आठ प्रकृतियोकी उदीरणा करनेपर द्वितीय समय, तत्पश्चात् ही सम्यक्त्वके प्राप्त होनेपर मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीके विना छह प्रकृतियोकी उदीरणा करनेपर तृतीय समय अल्पतर-उदीरकका प्राप्त होता है । इसी प्रकार असंयतसम्यग्दृष्टिके संयमासंयमको प्राप्त होनेपर और संयतासंयतके संयमको प्राप्त होनेपर अल्पतर उदीरकके तीन समयप्रमाण उत्कृष्ट कालकी प्ररूपणा करना चाहिए। चूर्णिसू०-अवस्थित-उदीरकका कितना काल है ? ॥९६॥ समाधान-जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है ॥९७-९८॥ शंका-अवक्तव्य-उदीरकका कितना काल है ? ॥९९॥ समाधान-जघन्य और उत्कृष्टकाल एक समयप्रमाण है ।।१००॥ विशेषार्थ-इसका कारण यह है कि सर्वोपशमनासे गिरकर प्रथम समयमे उदीरणा प्रारंभ करनेवाले जीवके अतिरिक्त अन्यत्र अवक्तव्य-उदीरणाका होना असंभव है। १ कुदो, एयसमयमप्पथर कादूण तदणतरसमए मुजगारमवदि वा गदस्स तदुवलभादो । जयध २ त जहा-मिच्छा इट्ठी दस पयडीओ उदीरेमाणगो भयवोच्छेदेण णवण्हमुदीरगो होदूणेक्को अप्पदरसमयो, से काले दुगुछोदयवोच्छेदेणहमुदीरगो होदूण विदियो अप्पयरसमयो, तदण तरसमए सम्मत्त पडिवण्णस्स मिच्छत्ताणताणुबधिवोच्छेदेण तदियो अप्पदरसमयो त्ति । एव अप्पदरपवेगस्स उक्कस्सकालो तिसमयमेत्तो । एव चेवासजदसम्माइढुिस्स सजमासजम पडिवनमाणस्स, सजदासजदस्स वा सजम पडिवजमाणस्स तिसमयमेत्तप्पदरुवस्सकालपरूवणा कायव्वा । जयध० , ३ त कथ, णवपयडिपवेसमाणस्स दुगुछागमेणेयसमय भुजगारपजाएण परिणमिय से काले तत्तियमेतणावठ्ठिदस्स तदणतरसमए भयवोच्छेदेणप्पदरपजायमुवगयस्स लडो एयसमयमेत्तो अवठ्ठिदजहण्णकालो। एवमण्णत्थ वि दठव्वं । जयध० ४ त जहा-दसपयडीओदीरेमाणस्स भय दुगुंछाणमुदयवोच्छेदेणग्यदर कादूणावठ्ठिदस्स जाव पुणो भय दुगु छाणमणुदयो ताव अतोमुहुत्तमेत्तो अवठ्ठिदपवेसगस्स उक्कस्सकालो होइ । जयध० ५ कुदो, सम्वोवसामणादो परिवदिदपढमसमय मोत्तूणण्णत्थ तदसभवादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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