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________________ प्रस्तावना (१८) कसायपाहुडके सम्यक्त्व अधिकारकी १०४, १०७, १०८ और १०६ नम्बरवाली ४ गाथाएँ थोड़ेसे पाठ-भेदके साथ कम्मपयडीके उपशमनाकरणमें क्रमश: गाथा नं० २३, २४, २५ और २६ पर पाई जाती हैं। यहाँ एक विशेष बात यह ज्ञातव्य है कि कम्मपयडीमें तो उक्त गाथाओं पर चूणि पाई जाती है, पर कसायपाहुडमें अन्य अनेक गाथाओंके समान सरल होनेसे इन गाथाओं पर चूर्णि नहीं लिखी गई है। . (१४) दर्शनमोह-उपशामकके परिणाम, योग, उपयोग और लेश्यादिका वर्णन कसायपाहुडचूर्णिमें इस प्रकार किया गया है पृ० ६१५, सू० ७. परिणामो विसुद्धो । ८. पुव्वं पि अंतोमुहुत्तप्पहुडि अणंतगुणाए विसोहीए विसुज्झमाणो अागदो । ६. जोगे ति विहासा । १०. अण्णदरमणजोगो वा अएणदरवचिजोगो वा ओरालियकायजोगो वा वेउब्वियकायजोगो वा । १४. उवजोगे त्ति विहासा । १५. णियमा सागास्वजोगो । १६. लेस्सा त्ति विहासा । १७. तेउ-परम-सुक्कलेस्साणं णियमा वड्ढमाणलेस्सा। इन सब सूत्रोंकी तुलना कम्मपयडीकी निम्न गाथासे कीजिये और देखिए कि किस खूबीके साथ सर्व सूत्रोंके अर्थका एक ही गाथामें समावेश किया गया है पुव्वं पि विसुझतो गंठियसत्ताणइक्कमिय सोहि । अन्नयरे सागारे जोगे य विसुद्धलेसासु ॥ ४ ॥ (१५) संयमासंयमलब्धिको प्राप्त करके यदि कोई नीचे गिर कर फिर ऊपर चढ़ता है तो उसका वर्णन कसायपाहुडचूर्णिमें इस प्रकार किया गया है पृ० ६६२, सू० २६. जदि संजमासंजमादो परिणामपच्चएण णिग्गदो पुणोवि परिणामपञ्चएण अंतोमुहुत्तेण पाणीदो संजमासंजम पडिवाइ, तस्स वि णस्थि द्विदिघादो वा अणुभागधादा वा । ३० जाव संजदासंजदो ताव गुणसे ढिं समए समए करेदि । विसुज्झतो असंखेजगुणं वा संखेजगुणं वा संखेजभागुत्तरं वा असंखेजभागुत्तरं वा करेदि । संकिलिस्संतो एवं चेव गुणहीणं वा विसेसहीणं वा करेदि । उक्त सन्दर्भका मिलान कम्मपयडीकी इस गाथासे कीजिएपरिणामंपच्चयाओ णाभोगगया गया अकरणाउ । गुणसेढी सिं निच्चं परिणामा हाणिवुढिजुया ॥ ३० ॥ ( उपशमनाक०) (१६) चारित्रमोह-उपशामनाधिकारमें अनिवृत्तिकरण गुणस्थानके अन्तर्गत होनेवाले कार्य-विशेषोंका वर्णन करते हुए चूर्णिकार कहते हैं पृ० ६८८, सू० ११५. तदो असंखेजाणं समयपवद्धाणमुदीरणा च । ११६. तदो संखेज्जेसु ठिदिबंधसहस्सेसु मणपजवणाणावरणीय-दाणंतराइयाणमणुभागो बंधेण देसघादी होइ । ११७. तदो संखेज्जेसु द्विदिवंधेसु गदेसु श्रोहिणाणावररणीयं अोहिदंसणावरणीयं लाभंतराइयं च बंधेण देसघादि करेदि । ११८. तदो संखे
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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