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________________ गा० ५८] प्रदेशसंक्रमस्थान-अल्पबहुत्व-निरूपण ४५९ ६६२. मिच्छत्तस्स पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि ।'६६३. सम्मामिच्छत्ते पदेससंकपट्टाणाणि विसेसाहियाणि । ६६४. हस्से पदेससंकमट्ठाणाणि अणंतगुणाणि। ६६५ रदीए पदेमसंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ६६६. इत्थिवेदे पदेससंकमट्ठाणाणि संखेज्जगुणाणि । ६६७ सोगे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ६६८. अरदीए पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ६६९. णकुंसयवेदे पदेससंकयट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ६७०. दुगुंछाए पदेससंकमट्ठाणाणि विसेमाहियाणि । ६७१. भये पदेससंकपट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ६७२. पुरिसवेदे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ६७३. कोहसंजलणे पदेससंकमट्ठाणाणि सखेज्जगुणाणि । ६७४. माणसंजलणे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ६७५. मायासंजलणे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ६७६. णिरयगईए सव्वत्थोवाणि अपञ्चक्खाणमाणे पदेससंकमाणाणि । ६७७, कोहे पदेससंकपट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ६७८. मायाए पदेससंकपट्टाणाणि विसेसा चूर्णिसू०-अनन्तानुबन्धीलोभसे मिथ्यात्वके प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। मिथ्यात्वसे सम्यग्मिथ्यात्वमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। सभ्यग्मिथ्यात्वसे हास्यमे प्रदेशसंक्रमस्थान अनन्तगुणित हैं। हास्यसे रतिमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक है। रतिसे स्त्रीवेदमें प्रदेशसंक्रमस्थान संख्यातगुणित है । स्त्रीवेदसे शोकमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं । शोकसे अरतिमें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। अरतिसे नपुंसकवेदमें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। नपुंसकवेदसे जुगुप्सामें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। जुगुप्सासे भयमें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक है। भयसे पुरुषवेदमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक है। पुरुषवेदसे संज्वलनक्रोधमें प्रदेशसंक्रमस्थान संख्यातगुणित हैं। संज्वलनक्रोधसे संज्वलनमानमें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक है। संज्वलनमानसे संज्वलनमायामे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं ॥६६२२६.५५॥ चर्णिम०-( गतिमार्गणाकी अपेक्षा ) नरकगीतमायानमान परेशान स्थान सबसे कम है । अप्रत्याख्यानमानसे अप्रत्याख्यानक्रोध, प्रदेशसंक्रमस्थानाप है। अप्रत्याख्यानक्रोधसे अप्रत्याख्यानमायामें प्रदेशसंक्रमस्थाने विशेष अधिक है। १ किं कारण, मिच्छत्तजहण्णचरिमफालिमुक्कस्सचरिमफालीदो सोहिय पद्धसेसदवादो सम्मानित तसुद्धसेसचरिमफाल्दिव्वस्स गुणसंकमभागहारेण खडिदेयखडमेत्त'ण अहियत्तदसणीदो, मिच्छाइटिठम्मि वि सम्मामिच्छत्तस्स अणताणं सकमठाणाणमहियाणमुवलभादो च । जयध० २ कुदो, देसघाइत्तादो । जयध० ३ कुदो बधगडापाहम्मादो | जयध० ४ कुदो, धुवबधित्तोणित्थि पुरिसवेदबधगद्धासु वि संचयोवलंभादो । जयघ० ५ कुदो; कसायचउभागेण सह णोकसायभागस्स सव्वरसेव कोहसजलणचरिमफाली सव्वसकम. सरूवेण परिणदस्सुवलभादो | जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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