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________________ ૪૪૦ कसाय पाहुड सुत्त ४६५. वरि पुरिसवेदस्सावट्ठिदसंकामया भजियव्वा' | ४६६. णाणाजीचेहि कालो दाणुमाणिय दव्वो । ४६७ णाणाजीवेहि अंतरं । ४६८. मिच्छत्तस्स भुजगार अ -अवत्तव्वसंकामयाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि १४६९. जहण्णेण एयसमओ । ४७०. उक्कस्सेण सत्तरादिदियाणि । ४७१. अप्पयर संकामयाणमंतर केवचिर' कालादो होदि १४७२. णत्थि अंतरं । ४७३. अवद्विद संकामयाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि १४७४. जह णेण एयसमओ । ४७५. उक्कस्सेण असंखेज्जा लोगा । [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार संक्रामक और अवस्थित संक्रामक नियमसे पाये जाते है । केवल पुरुषवेदके अवस्थित - संक्रामक भजितव्य है ॥४५९-४६५॥ चूर्णिसू० - इस भंगविचयकी अपेक्षा अनुमान करके नाना जीवोंकी अपेक्षा भुजाफारादि-संक्रामकोके कालको जानना चाहिए || ४६६॥ चूर्णिसु० - अब नाना जीवोकी अपेक्षा भुजाकारादिसंक्रामको के अन्तरकालको कहते हैं ॥४६७॥ शंका- मिथ्यात्व के भुजाकार और अवक्तव्यसंक्रामक जीवोका अन्तरकाल कितना है ? ॥ ४६८ ॥ समाधान - जवन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल सात रात्रिदिवस है ? ४६९ - ४७० ॥ शंका- मिथ्यात्व के अल्पतरसंक्रामकोका अन्तरकाल कितना है ? || ४७१॥ समाधान - मिथ्यात्व के अल्पतरसंक्रामकोका अन्तर कभी नही होता ||४७२ || शंका- मिध्यात्वके अवस्थितसंक्रामकोका अन्तरकाल कितना है ? || ४७३॥ समाधान - जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल असंख्यात लोकप्रमाण है ॥४७४-४७५॥ १ कुदो, सिमधुवभा वित्तेण सम्माइट्ठीसु कत्थ वि कदाइमाविन्भावदसणादो | जयध० २ भुजगारसकामयाण ताव उच्चढे-एको वा दो वा तिण्णि वा एवमुक्कस्सेण पलिदोवमस्स असखेजदिभागमेत्ता वा मिच्छाइट्ठी उवसमसम्मत पडिवनिय गुणसकमचरिमसभए वट्टमाणा भुजगारकामया दिट्ठा, णट्ठो च तदणतरसमए तेसि पवाहो । एवमेयसमयमतरिदपवाहाणं पुणो वि णाणाजीवाणुसधाणेणाणंतरसमए समुब्भवो दिट्ठी । विणट्ठतरं होइ । एवमवत्तव्वसकामयाण पि वत्तव्व । णवरि सम्मत परिवण्णपदमसमए आदी कायव्वा । जयध० ३ कुदो; सम्मत्तग्गाहयाणमुक्कस्तरस्त तप्पमाणत्तोवएसादो | जयध० ४ कुदो; एयवारमवट्ठिदपरिणामेण परिणटणाणाजीवाणमेत्तियमेत्त कस्सतरेण पुणो अवट्ठिदसकमहेदु परिणाम विसेसप डिलंभादो | जयध० छताम्रपत्रवाली प्रतिमें ‘अवत्तव' के स्थानपर 'अप्पयर' पाठ मुद्रित है । ( देखो पृ० १२७७ ) पर वह अशुद्ध है, क्योंकि ‘अल्पतर सक्रामकके' कालका निरूपण आगे के सूत्र नं० ४७१ में किया गया है ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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