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________________ गा० ५८ ] प्रदेशसंक्रम-भुजाकार - अन्तर- निरूपण ४३७ ४३३. हस्स-रइ- अरइ- सोगाणं भुजगार- अप्पयर संकामयं तरं केवचिर कालादो होदि १ ४३४. जहणेण एयसमओ । ४३५. उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं । ४३६. कथं ताव हस्स - रदि- अरदि- सोगाणमेय समयमंतर १४३७. हस्त-रदिभुजगार संकामयंतर जह इच्छसि, अरदि-सोगाणमेवसमयं बंधावेदव्वो । ४३८. जड़ अप्पयरसं कामयं तरमिच्छसि, हस्स-रदीओ एयसमयं बंधावेयन्वाओ । ४३९ अवत्तव्वसंकामयंतरं केवत्तिर कालादो शंका-हास्य, रति, अरति और शोकके भुजाकार और अल्पतर संक्रामकोका अन्तरकाल कितना है ? ||४३३॥ समाधान-जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है । ।।४३४-४३५।। शंका- हास्य- रति और अरति शोकके भुजाकार और अल्पतरसंक्रामकोका जघन्य अन्तर एक समय कैसे संभव है ? ||४३६ ॥ समाधान- यदि हास्य और रतिके भुजाकारसंक्रामकका जघन्य अन्तर जानना चाहते हो, तो अरति और शोकका एक समय प्रमित बन्ध कराना चाहिए | और यदि अल्पतरसंक्रामकका अन्तर जानना चाहते हो, तो हास्य और रतिका एक समय-प्रमित बन्ध कराना चाहिए ||४३७-४३८॥ 1 विशेषार्थ- कोई जीव हास्य रतिका बन्ध कर रहा था, उसने एक समय के लिए अरति शोकका बन्ध किया और तदनन्तर समयमें ही हास्य रतिका वन्ध करने लगा । इस प्रकार हास्य रतिका बंध कर और बन्धावली के व्यतीत होनेपर बन्धके अनुसार संक्रमण करनेवाले जीवके एक समय प्रमित भुजाकारसंक्रमणका अन्तर सिद्ध हो जाता है । अल्पतरसंक्रमणका अन्तर इस प्रकार निकलता है कि कोई जीव अरति शोकका बन्ध कर रहा था, उसने एक समय के लिए हास्य रतिका बन्ध किया और तदनन्तर समयमे ही पुनः अरतिशोकका बन्ध करने लगा । इस प्रकार उक्त प्रकृतियोको बाँधकर और बन्धावलीके व्यतीत होनेपर उसका संक्रमण किया, तब एक समयप्रमित जघन्य अन्तर सिद्ध हो जाता है । इसी प्रकार अरति और शोकके भुजाकार और अल्पतरसंक्रामकका जघन्य अन्तर निकालना चहिए | शंका- हास्य, रति, अरति और शोकके अवक्तव्यसंक्रामकका अन्तरकाल कितना है ? ॥४३९॥ १ त जहा - हस्स-रदीओ बधमाणो एयसमयमर इ-सोगबधगो जादो । तदो पुणो वि तदणंतरसमए इस्स रदीण बधगो जादो | एव वधिदूण बधावलियवदिकमे बधाणुसारेण सकामेमाणयस्त लदूधमेयसमयमेत्तभुजगारसकामयतर । जयध० २ एदस्स दिरिसण - एयो अरदिसोगबधगो एयसमय हस्स-रदिवधगो जादो । तदणतरसमए पुणो वि परिणामपच्चएणारदिसोगाण बधो पारद्घो । एव बधिऊण बघावलियादिकमेदेणेव कमेण सकामेमाणयत्स लद्घमेयसमयमेत्त पयदजहण्ण तर । एदेणेव निदरिसणेणारदि-सोगाण पि भुजगारप्पयरसकामतर मेयसमयमत्त इस्सरइविवनासेण जोजेयव्वं । जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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