SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 543
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गा० ५८ ] प्रदेश संक्रम-भुजाकार - अन्तर-निरूपण ४३५ ३९७. जहण्णेण एयसमओ । ३९८. उक्कस्सेण वे छावट्टिसागरोवपाणि सादिरेयाणि । ३९९. अवद्विदसं कामयंतरं केवचिरं कालादो होदि १४०० जहणेणेयसमओ । ४०१. उक्कस्सेण अनंतकालमसंखेज्जा पोग्गलपरियट्टा । ४०२ अवत्तव्वसंकामयंतरं केव चिरं कालादो होदि १४०३. जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । ४०४. उक्कस्सेण उबड्डूपोग्गलपरियड' | ४०५. वारसकसाय- पुरिसवेद-भय-दुर्गंछाणं भुजगारप्पयरसं कामयं तरं केवचिरं कालादो होदि ? ४०६. जहणेण एयसमओ । ४०७, उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो' । 3 ४०८. अवद्विदसं कामयं तरं केवचिरं कालादो होदि : ४०९. जहणेण एयसमओ । ४१०. उक्कस्सेण अनंतकालमसंखेज्जा पोग्गलपरियट्टा । ४११. णवरि पुरिस - वेदस्स उवडपोग्गलपरियङ्कं । ४१२. सम्बेसिमवत्तव्य कामयं तरं केवचिरं कालादो समाधान - जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ अधिक दो वार छयासठ सागरोपम है ।। ३९७ - ३९८॥ शंका-उक्तकपायो के अवस्थित - संक्रामकका अन्तरकाल कितना है ? || ३९९॥ समाधान-जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण अन्तरकाल है ।।४००-४०१ ।। शंका-उक्त कषायोके अवक्तव्यसंक्रामकका अन्तरकाल कितना है ? ||४०२।। समाधान-जघन्य अन्तरकाल अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तरकाल उपार्धपुद्गलपरिवर्तन है ।।४०३- ४०४॥ शंका- अप्रत्याख्यानावरणादि वारह कषाय, पुरुषवेद भय और जुगुप्साके भुजाकार और अल्पतर संक्रामकोका अन्तरकाल कितना है ? || ४०५ || समाधान - जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल पल्योपमके असंख्यात भागप्रमाण है ।।४०६-४०७।। शंका-उक्त कर्मोंके अवस्थित संक्रामकोका अन्तरकाल कितना है ? ||४०८॥ समाधान- जधन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात पुद्गल - परिवर्तन- प्रमित अनन्तकाल | केवल पुरुषवेदका उत्कृष्ट अन्तरकाल उपार्ध पुद्गलपरिवर्तन है ।।४०९-४११।। शंका-उपयुक्त सर्व कर्मोंके अवक्तव्यसंक्रामकोका अन्तरकाल कितना है ? ॥ ४१२ ॥ १ कुदो; एयवारमवट्ठदसकमेण परिणदस्त पुणो तदसंभवेणासखेज योग्गल परियमेत्तकालमुक्कस्पेणावठाणभुवगमादो | असखेजलोग मेत्तमुक्कस्सतरभवट्ठिदपदस्स परुविद मुच्चारणाकारेण । कथमेदेण सुत्तरेण तस्साविरोहोत्ति ? ण, उवएसतरावलवणेणाविरोहसमत्यणादो | जयघ० २ भुजगारप्पयराणमण्णोष्णु कस्स का लेणावट्रिट्ठदकालसहिदेणतरिदाणमुकत्सतरस्य तप्यमाणत्तोवलभादो । जयध ३ कुदो, सम्माइट्रिट्ठम्मि चेव तदवट्ठिदसकमत्स सभवणियमादो | जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy