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________________ ४२७ गा० ५८] - प्रदेशसंक्रम-भुजाकार-स्वामित्व-निरूपण २९२. सोलसकसायाणं भुजगारसंकामगो अप्पदरसंकामगो अवढिदसंकामगो अवत्तव्यसंकामगो को होदि ? २९३. अण्णदरो' । २९४. एवं पुरिसवेद-भय-दुगुंछाणं । २९५. णवरि पुरिसवेद-अवडिदसंकामगो णियमा सम्पाइट्ठी' । २९६. इत्थि-णqसयवेदहस्स-रइ-अग्इ-सोगाणं भुजगार-अप्पदर अवत्तव्यसंकमो कस्स ? २९७. अण्णदरस्स । ___ २९८. कालो एयजीवस्स । २९९. मिच्छत्तस्स भुजगारसंकमो केवचिरं कालादो होता है । यह क्रम विध्यातसंक्रमणको प्रारम्भ करनेके प्रथम समय तक जारी रहता है । यह कथन सम्यग्मिथ्यात्वकी सत्ता नहीं रखनेवाले मिथ्यादृष्टिकी अपेक्षा किया गया है । किन्तु जिस मिथ्याष्टिक उसकी सत्ता है, वह जब उपशमसम्यक्त्व उत्पन्न करता है, तब उसके प्रथम समयसे लेकर गुणसंक्रमणके अन्तिम समय तक भुजाकारसंक्रमण होता रहता है। यतः यह सूत्र देशामर्शक है, अतः यह भी सूचित करता है कि सम्यग्दृष्टिके मिथ्यात्वको प्राप्त होनेपर उसके प्रथम समयमें अधःप्रवृत्तसंक्रमण होनेसे भुजाकारसंक्रमण होता है । तथा सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना करनेवाला मिथ्यादृष्टि जव वेदकसम्यक्त्वको ग्रहण करता है, तव उसके प्रथम समयमे भी विध्यातसंक्रमणके होनेसे भुजाकारसंक्रमणका होना संभव है। ___ शंका-अनन्तानुवन्धी आदि सोलह कषायोका भुजाकारसंक्रामक, अल्पतरसंक्रामक, अवस्थितसंक्रामक और अवक्तव्यसंक्रामक कौन है ? ॥२९२॥ समाधान-यथासंभव कोई एक सम्यग्दृष्टि या मिथ्यादृष्टि जीव चारो प्रकारके संक्रमणोका संक्रामक होता है ॥२९३॥ चूर्णिसू०-इसी प्रकार पुरुषवेद भय और जुगुप्साके भुजकारादि संक्रामक जानना चाहिए । विशेषता केवल यह है कि पुरुषवेदका अवस्थितसंक्रामक नियमसे सम्यग्दृष्टि जीव ही होता है ॥२९४-२९५॥ शंका-स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, हास्य, रति, अरति और शोकप्रकृतियोका भुजाकार, अल्पतर और अवक्तव्य संक्रमण किसके होता है ? ॥२९६॥ समाधान-किसी एक सम्यग्दृष्टि या मिथ्यादृष्टिके होता है ॥२९७॥ चूर्णिसू०-अब भुजाकारादि संक्रमणोका एक जीवकी अपेक्षा काल कहते हैं ।।२९८॥ शंका-मिथ्यात्वके भुजाकारसंक्रमणका कितना काल है ? ॥२९९॥ १ अणनाणुवधीण ताव भुजगारसकामगो अण्णदरो मिच्छाइट्ठी सम्माइटठी वा होइ, मिच्छाइट्टिम्मिणिरतरवधीण तेसिं तदविरोहादो । सम्माइछिम्मि वि गुणसकमपरिणदम्मि सम्मत्तग्गहणपढमावल्यिाए वा विदियादिसमएसु तदुवलद्धीदो। अणताणुबधीणमवत्तव्वसकामगो अण्णदरो त्ति वुत्ते विमजोयणापुव्वसजोगपढमसमयणवकवधमावलियादिक्कत सकामेमाणयस्स मिच्छाइटिस्स सासणसम्माइटिटम्स वा गहण कायव्व । एव चेव सेसकसायाण पि भुजगारादिपदाणमण्णदरसामित्ताहिम्बधो अणुगतब्बो । णवरि तेसिमवत्तव्यसकामगो अण्णदरो सम्बोवसामणापडिवादसमए वट्टमाणगो सम्माइट्ठी चेव होइ, णाणो त्ति वत्तव्य । २ कुदो, सम्माइट्ठीदो अण्णत्थ पुरिमवेदस्स णिरतरबधित्ताभावादो । ण च णिरतरवधेण विणा अवठ्दिसकमसा मित्तविहाणसभवो; विरोहादो । जयध० जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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