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________________ ४२६ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार २८४. सम्मत्तस्स भुजगारसंकामगो को होदि ? २८५. सम्मत्तमुवेल्लमाणयस्स अपच्छिमे द्विदिखंडए सबम्हि चेव भुजगारसंकामगो'। २८६. तव्यदिरित्तो जो संकामगो सो अप्पयरसंकामगो वा अवत्तव्यसंकामगो वा । २८७. सम्मामिच्छत्तस्स भुजगारसंकामगो को होइ ? २८८. उज्वेल्लमाणयस्स अपच्छिमे द्विदिखंडए सबम्हि चे । २८९. खवगस्स वा जाय गुणसंकमेण संछुहदि सम्मामिच्छत्तं ताव भुजगारसंकामगो । २९०. पहमसम्मत्तमुप्पादयमाणयस्स वा तदियसमयप्पहुडि जाब विज्झादसंकमपहमसमयादो त्ति । २९१. तव्वदिरित्तो जो संकामगो सो अप्पदरसंकायगो वा अवत्तव्यसंकामगो वा। शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिका भुजाकार-संक्रमण कौन करता है ? ॥२८४॥ समाधान-सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना करनेवाले जीवके अन्तिम स्थितिखंडके सर्व ही कालमे भुजाकारसंक्रमण होता है । भुजाकार-संक्रमणके अतिरिक्त यदि वह संक्रामक है, तो या तो अल्पतरसंक्रमण करता है, अथवा अवक्तव्यसंक्रमण करता है ।।२८५-२८६।। शंका-सम्यग्थ्यिात्वका भुजाकारसंक्रमण कौन करता है ? ॥२८७।। समाधान-सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना करनेवाले जीवके अन्तिम स्थितिखंडके सर्व ही कालमे सम्यग्मिथ्यात्वका भुजाकारसंक्रमण होता है । अथवा क्षपकके जब तक वह गुणसंक्रमणसे सम्यग्मिथ्यात्वको संक्रमित करता है, तब तक वह भुजाकार-संक्रामक है । अथवा प्रथमोपशमसम्यक्त्वको उत्पन्न करनेवाले जीवके तृतीय समयसे लेकर विध्यातसंक्रमणके प्रथम समय तक सम्यग्मिथ्यात्वका भुजाकारसंक्रमण होता है। सम्यग्मिथ्यात्वके भुजाकारसंक्रमणके अतिरिक्त यदि वह संक्रामक है, तो या तो अल्पतरसंक्रामक है, अथवा अवक्तव्यसंक्रामक है ॥२८८-२९१॥ विशेपार्थ-सम्यग्मिथ्यात्वका भुजाकारसंक्रमण तीन प्रकारसे बतलाया गया है । इनमे प्रथम और द्वितीय प्रकार तो स्पष्ट है। तीसरे प्रकारका स्पष्टीकरण इस प्रकार हैसम्यग्मिथ्यात्वकी सत्तासे रहित मिथ्यादृष्टि जीव जब प्रथमोपशमसम्यक्त्वको उत्पन्न करता है, तब उसके प्रथम समयमें सम्यग्मिथ्यात्वकी सत्ता होती है और द्वितीय समयमे अवक्तव्यसंक्रमण होता है। पुनः उसके तृतीयादि समयोमे गुणसंक्रमणके वशसे भुजाकारसंक्रमण १ कुदो, तत्य गुणसकमणियमट सणादो । जयध ० २ किं कारण ? उबेल्लणचरिमझिदिखंडयादो अण्णत्थ जहासभवमप्पदरावत्तव्वस कमाण चेव सभव: दसणाटो। जयध० ३ कुदो, तत्थ गुणसकमणियमदसणादो। जयध. ४ कुदो; दसणमोहक्खवया पुवकरणपढमसमयप्पहडि जाव सबसकमो त्ति ताव सम्मामिछत्तत्त गुणसकमसभवत्रमेण तत्य भुजगारसिद्धीए विसवादाभावादो । जयध ५ जदो एट देसामासिय, तदो सम्माइटिठणा मिच्छत्ते पडिवणे तप्पढमसमयम्मि अधापयत्तसक्मण भुजगारमकमो होइ, तहा उवेल्लमाणमिच्छाइट्ठिणा वेदयमम्मत्ते गहिदे तस्स पढमममए वि विज्यादनक मेण भुजगारसकमसभवो वत्तव्यो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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