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________________ ४२४ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार २६८. सामित्तं । २६९. मिच्छत्तस्स भुजगारसंकामओ को होइ ? २७०. पडमसम्मत्तमुप्पादयमाणगो पडमसमए अवत्तव्यसंकामगो । सेसेसु समएसु जाव गुणसंकमो ताव भुजगारसंकामगो' । २७१. जो वि दंसणमोहणीयक्खवगो अपुव्यकरणस्स पढमसमयमादि कादूण जाव मिच्छत्तं सबसंकमेण संछुहदि ति ताव मिच्छत्तस्स भुजगारसंकामगो । २७२. जो वि पुषुप्पणेण सम्मत्त ण मिच्छत्तादो सम्मत्तमागदो तस्स पढमसमयसम्माइट्ठिस्स जं बंधादो आवलियादीदं मिच्छत्तस्स पदेसग्गं तं विज्झादसंकमेण संकामेदि आवलियचरिमसमयमिच्छाइद्विमादि कादूण जाव चरिमसमयमिच्छाइट्टि त्ति एत्थ जे समयपबद्धा ते समयपबद्ध पहमसमय सम्माइट्टि त्ति ण संकामेह | से कालप्पहुडि जस्स जस्स बंधावलिया पुण्णा तदो तदो सो संकामिजदि । एवं पुयुप्पाइदेण सम्मत्तेण जो सम्मत्तं पडिवज्जइ तं दुसमयसम्माइडिमादि कादूण जाव आवलि चूर्णिसू०-अब भुजाकार प्रदेशसंक्रमणके स्वामित्वको कहते है ॥२६८॥ शंका-मिथ्यात्वका भुजाकार-संक्रामक कौन है ? ॥२६९॥ समाधान-प्रथमोपशमसम्यक्त्वको उत्पन्न करनेवाला जीव प्रथम समयमे मिथ्यात्वका अवक्तव्यसंक्रामक है। शेष समयोमें जब तक गुणसंक्रमण रहता है, तब तक वह मिथ्यात्व का भुजाकार-संक्रामक है ॥२७०॥ अब प्रकारान्तरसे भुजाकारसंक्रमके स्वामित्वको कहते हैं चूर्णिसू ०-और जो दर्शनमोहनीयका क्षपण कर रहा है, वह अपूर्वकरणके प्रथम समयको आदि लेकर जब तक सर्वसंक्रमणसे मिथ्यात्वका संक्रमण करता है, तब तक मिथ्यात्वका भुजाकारसंक्रामक रहता है। तथा जिसने पूर्वमै सम्यक्त्व उत्पन्न किया है, वह जीव मिथ्यात्वसे सम्यक्त्वमे आया, उस प्रथम समयवर्ती सम्यग्दृष्टिके जो बन्ध-समयके पश्चात् एक आवली अतीत काल तकके मिथ्यात्वके प्रदेशाग्र है, उन्हे विध्यातसंक्रमणसे संक्रमित करता है । चरम आवलीकालवाले चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टिको आदि करके जव तक वह चरमसमयवर्ती मिथ्याष्टि है, तब तक इस अन्तरालमे जो समयप्रवद्ध वॉधे हैं, उन समयप्रवद्धोको प्रथम समयवर्ती सम्यग्दृष्टि होने तक संक्रमण नहीं करता है । तदनन्तरकालसे लेकर जिन जिनकी बंधावली पूर्ण हो जाती है, उन उन कर्मप्रदेशोको वह संक्रमण करता है। इस प्रकार पूर्वोत्पादित सम्यक्त्वके साथ जो सम्यक्त्वको प्राप्त होता है, उस द्वितीय समयवर्ती सम्यग्दृष्टिको आदि करके जब तक आवलीकालवर्ती सम्यग्दृष्टि रहता है, तब तक १ (कुदो,) पुयमसकतस्स तस्स ताधे चेव सम्मत्त-सम्मामिच्छत्तसरूवेण सकतिदसणादो। जयध° २ कुदो; पडिसमयमसखेजगुणाए सेढीए गुणसंकमेण मिच्छत्तपदेसग्गत्स तत्थ सकतिदसणादो। जयध° ३ अपुव्यकरणद्धाए सन्यत्थ अणियट्टिकरणद्धाए च जाव मिच्छत्तस्स सव्वसंकमसमयो ताव अतो. मुहुत्तमेत्तकालं गुणसकमेण भुजगारसंकामगो होइ त्ति भणिद होइ । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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