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________________ गा० ५८] प्रदेशसंक्रम-अल्पवहुत्व-निरूपण विसेसाहिओ । १२९. मायाए उकस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ । १३०. लोभे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। १३१. हस्से उक्कस्सपदेससंकयो अणंतगुणो'। १३२. रदीए उकस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ । १३३. इत्थिवेदे उ कस्सपदेससंकमो संखेज्जगुणो । १३४ सोगे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ । १३५. अरदीए उकस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। १३६. णqसयवेदे उक्कस्सपदे ससंकमो विसेसाहिओ। १३७. दुगुंछाए उकस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ । १३८. भए उकस्सपदेससंक्रमो विसेसाहिओ । १३९. पुरिसवेदे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। १४०. माणसंजलणे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। १४१. कोहसंजलणे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ । १४२. मायासंजलणे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। १४३. लोहसंजलणे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। १४४. एवं सेसासु गदीसु णेदव्वं । १४५. तदो एईदिएसु सव्वत्थोवो सम्मत्त उक्कस्सपदेससंकमो। १४६. सम्मामिच्छत्तस्स उक्कस्सपदेससंकमो असंखेज्जगुणो' । १४७. अपञ्चखाणमाणे अनन्तानुबन्धी क्रोधसे अनन्तानुबन्धी मायामे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । अनन्तानुवन्धी मायासे अनन्तानुबन्धी लोभमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । ॥१२६-१३०॥ चर्णिम ०-अनन्तानुवन्धी लोभसे हास्यमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण अनन्तगुणित होता है। हास्यसे रतिमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। रतिसे स्त्रीवेदमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण संख्यातगुणित होता है। स्त्रीवेदसे शोकमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। शोकसे अरतिमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । अरतिसे नपुंसकवेदमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। नपुंसकवेदसे जुगुप्सामे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । जुगुप्सासे भयमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। भयसे पुरुपवेदमें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है। पुरुपवेदसे संज्वलनमानमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। संज्वलनमानसे संज्वलनक्रोधमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। संज्वलनक्रोधसे संज्वलनमायामे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। संज्वलनमायासे संज्वलनलोभमे उत्कृष्ट प्रदेशसंकमण विशेप अधिक होता है। इसी प्रकार शेष गतियोमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण-सम्वन्धी अल्पबहुतत्व जानना चाहिए ॥१३१-१४४॥ __ चूर्णिसू०-इद्रियमार्गणाकी अपेक्षा एकेन्द्रियोमे सम्यक्त्वप्रकृतिमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण सबसे कम होता है। सम्यक्त्वप्रकृतिसे सम्यग्मिथ्यात्वमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण १ कुदो, सबघादिपदेसग्ग पेक्खिऊण देसघादिपदेसग्गस्साणतगुणत्त सदेहाभावादो । जयध० २ कुदो, ढोण्हमेदेसिं अधापवत्तण सामित्तपडिलभाविसेसेवि दवविसेसमस्सिऊण तत्तो एदस्सासखेजगुण भहियकमेणावठाणदसणादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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