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________________ ४१४ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार ११४. माणसंजलणे उक्कस्सपदेससंकयो विसेसाहिओ'। ११५. मायासंजलणे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। ११६. णिरयगईए सव्वत्थोवो सम्मत्ते उक्कस्सपदेससंकयो। ११७. सम्मामिच्छत्ते उक्कस्सपदेससंकमो असंखेज्जगुणो । ११८. अपचक्खाणमाणे उक्कस्सपदेससंकमो असंखेज्जगुणो । ११९. को उकस्सपदेससंकयो विसेसाहिओ। १२०. मायाए उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। १२१. लोहे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ । १२२. पच्चरखाणमाणे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। १२३. कोहे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ । १२४. मायाए उकस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ । १२५. लोहे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ । १२६. मिच्छत्ते उक्कस्सपदेससंकमो असंखेन्जगुणो । १२७. अणंताणुबंधिमाणे उक्कस्सपदेससंकमो असंखेज्जगुणो । १२८. कोधे उक्कस्सपदेससंकमो है। संज्वलनक्रोधसे संज्वलनमानमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। संज्वलन सानसे संज्वलनमायामे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है ॥१०१-११५॥ चूर्णिसू०-गतिमार्गणाकी अपेक्षा नरकगतिमे सम्यक्त्वप्रकृतिमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण वक्ष्यमाण पदोंकी अपेक्षा सवसे कम होता है । सम्यक्त्वप्रकृतिसे सम्यग्मिथ्यात्वमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है। सम्यग्मिथ्यात्वसे अप्रत्याख्यानमानमें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है। अप्रत्याख्यानमानसे अप्रत्याख्यान क्रोधमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। अप्रत्याख्यानक्रोधसे अप्रत्याख्यानमायामे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। अप्रत्याख्यानमायासे अप्रत्याख्यानलोभमें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। अप्रत्याख्यानलोभसे प्रत्याख्यानमानमें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है। प्रत्याख्यानमानसे प्रत्याख्यानक्रोधमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। प्रत्याख्यानक्रोधसे प्रत्याख्यानमायामे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। प्रत्याख्यानमायासे प्रत्याख्यानलोभमें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है ॥११६-१२५॥ चूर्णिसू०-प्रत्याख्यानलोभसे मिथ्यात्वमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है । मिथ्यात्वसे अनन्तानुवन्धी मानमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है । अनन्तानुवन्धी मानसे अनन्तानुवन्धी क्रोधमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । १ केत्तियमेत्तण १ पंचमभागमेत्तण | जयध० २ कुदो, मिच्छत्तादो गुणसंक्रमेण पडिच्छिददव्यमधापवत्तभागहारेण खंडिदेयखहपमाणत्तादो। जयध० ३ कुदो; दोण्हमेयविसयसामित्तपडिलभे वि सामित्तमूलव्वादो सम्मामिच्छत्तमूलदव्वस्सासखेनगुणत्तमरिसऊण तहाभावसिद्धोदो। जयध० ४ दोण्हमधापवत्तसकमविसयत्त वि दव्वगयविसेसोवलभादो | जयध० ५ किं कारण ? अधापवत्तसक्रमादो पुबिल्लादो गुणसंकमदव्वस्सेटस्सासखेजगुणत्त विसवादाणुवलभादो। जयध ६ केण कारणेण ? सव्वसक्रमेण पडिलधुक्कस्सभावत्तादो | जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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