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________________ ४१२ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार णवरि लोभसंजलणं विसेसहीणं संकामेदि । ८५. सेसाणं कम्माणं साहेयव्वं । ८६. सब्वेसिं कम्माणं जहण्णसण्णियासो विहासेयव्यो । ८७. अप्पाबहुअं । ८८. सव्वत्थोवो सम्मत्ते उक्कस्सपदेससंकमो। ८९. अपञ्चक्खाणमाणे उक्कस्सओ पदेससंकमो असंखेज्जगुणो । ९०. कोहे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ । ९१. मायाए उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। ९२. लोभे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। ९३. पच्चक्खाणमाणे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। ९४.कोहे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। ९५.मायाए उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। ९६. लोमे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। ९७. अणंताणुवंधिमाणे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। ९८, कोहे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ। ९९. मायाए उक्कस्सख्यातगुणित हीन होता है । विशेपता केवल यह है कि संज्वलनलोभका विशेष हीन संक्रमण करता है। शेप कर्मों के उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमणसम्बन्धी सन्निकर्पको इसी प्रकारसे सिद्ध करना चाहिए ॥७८-८५॥ चूर्णिसू०-सर्व कर्मोके जघन्य प्रदेशसंक्रमण-सम्बन्धी सन्निकर्षकी प्ररूपणा करना चाहिए ।।८६॥ चूर्णिसू०-अव प्रदेशसंक्रमणके अल्पवहुत्वको कहते है-सम्यक्त्वप्रकृतिमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम होता है । सम्यक्त्वप्रकृतिसे अप्रत्याख्यानमानमें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है। अप्रत्याख्यानमानसे अप्रत्याख्यानक्रोधमें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। अप्रत्याख्यान क्रोधसे अप्रत्याख्यानमायामे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । अप्रत्याख्यानमायासे अप्रत्याख्यानलोभमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । अप्रत्याख्यानलोभसे प्रत्याख्यानमानमें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। प्रत्याख्यानमानसे प्रत्याख्यानक्रोधमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। प्रत्याख्यानक्रोधसे प्रत्याख्यानमायामे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। प्रत्याख्यानमायासे प्रत्याख्यानलोभमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। प्रत्याख्यानलोभसे अनन्तानुवन्धीमानमें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है। अनन्तानुवन्धीमानसे अनन्तानुवन्धीक्रोधमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है। अनन्तानुवन्धीक्रोधसे अनन्तानुवन्धीमायामे उत्कृष्ट १ कुदो, दसणमोहक्खवणाविसए लोहसजलणस्स अधापवत्तसकमादो चरित्तमोहक्खवयसामित्तविसईकयअघापवत्तसक्रमस्स गुणसेढिणिजरापरिहीणगुणसकमदवसासखेजदिभागमेत्तेण विसेसाहियत्तदसणादो । जयघ २ कुदो; सम्मत्तदव्वे अधापवत्तभागहारेण खंडिदे तत्थेयखडपमाणत्तादो । जयध ३ कुदो, मिच्छत्तसयलदव्वादो आवलियाए असखेजभागपडिमागेण परिहीणदव्वं घेत्तूण सव्यसकमेणेदस्सुक्कस्ससामित्तविहाणादो । एत्य गुणगारो गुणसकमभागहारपदुप्पण्णअधापवत्तभागहारमेत्तो । जयध° ४ कुदो, दोण्हमेदेसिं सामित्तभेदाभावे वि पयडिविसेसमेत्तेण तत्तो एदस्साहियमावोवलद्धीदो । नयध°
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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