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________________ ४०२ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार २४. सम्मत्तस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? २५. गुणिदकम्मसिएण सत्तमाए पुढवीए णेरइएण मिच्छत्तस्स उकस्सपदेससंतकम्ममंतोमुहुत्तेण होहिदि त्ति सम्मत्तमुप्पाइदं, सव्वुकस्सियाए पूरणाए सम्मत्तं पूरिदं । तदो उवसंतद्धाए पुण्णाए मिच्छत्तमुदीरयमाणस्स पढमसमयमिच्छाइद्विस्स तस्स उकस्सओ पदेससंकमो। २६. सो वुण अधापवत्तसंक्रमो। ___ २७. सम्मामिच्छत्तस्स उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? २८. जेण मिच्छत्तस्स वहॉपर उसने बहुतसे पर्याप्तक भव और थोड़े अपर्याप्तक भव धारण किये। उनमे पर्याप्तकाल दीर्घ और अपर्याप्त काल ह्रस्व ग्रहण किया । उस पृथ्वीकायिकमे रहते हुए वह वार-बार बहुतसे उत्कृष्ट योगस्थानोको और उत्कृष्ट संक्लेशको प्राप्त हुआ। वहॉपर जब भी नवीन आयुका वन्ध किया, तब जघन्य योगस्थानमे वर्तमान होकर किया। वहॉपर उसने उपरितन स्थितियोमे कर्म-प्रदेशोका बहुत निक्षेपण किया। इस प्रकार वादर पृथ्वीकायिकोमे परिभ्रमण करके निकला और वादर-त्रसकायिकोमें उत्पन्न हुआ। वहॉपर भी साधिक दो हजार सागर तक उपर्युक्त विधिसे परिभ्रमण करके अन्तमे सातवीं पृथ्वीमे उत्पन्न हुआ। वहॉपर वार-बार उत्कृष्ट योगस्थान और उत्कृष्ट संक्लेशको प्राप्त हुआ । इस प्रकार उत्तरोत्तर गुणितक्रमसे कर्मप्रदेशोका संचय करनेवाले जीवको गुणितकर्माशिक कहते हैं। शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥२४॥ समाधान--सातवी पृथिवीमे जो गुणितकांशिक नारकी है और जिसके मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म अन्तर्मुहूर्तसे होगा, उसने सम्यक्त्व उत्पन्न किया और सर्वोत्कृष्ट पूरणासे अर्थात् सर्वजघन्य गुणसंक्रमणभागहारसे और सर्वोत्कृष्ट गुणसंक्रमणपूरणकालसे सम्यक्त्वप्रकृतिको पूरित किया। तदनन्तर उपशमकालके पूर्ण होनेपर मिथ्यात्वकी उदीरणा करनेवाले उस प्रथमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टिके सम्यक्त्वप्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण होता है । और यह अधःप्रवृत्तसंक्रमण है ॥२५-२६॥ शंका-सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥२७॥ समाधान-जिसने मिथ्यात्वके उत्कृष्ट प्रदेशाग्रको सम्यग्मिथ्यात्वमे प्रक्षिप्त किया, १ संछोभणाए दोण्हं मोहाणं वेयगस्स खणसेसे। उप्पाइय सम्मत्तं मिच्छत्तगए तमतमाए ॥८२॥ भिन्नमुहुत्ते लेसे तञ्चरमावस्लगाणि किच्चेत्थ । संजोयणाविसंजोयगस्स संछोमणे एसि ॥८३॥ कम्मप०, प्रदेशसंझ०, एतदुक्तं भवति-तहा वूरिदसम्मत्तो तेण दयेणाविणट्टेणुवसमसम्मत्तकालमतोमुहुत्तमणुपालेऊण तदवसाणे मिच्छत्तमुदीरयमाणो पढमसमयमिच्छाइट्ठी जादो। तत्स पढमसमयमिच्छाइद्वित्स पयदुक्कस्ससामित्ताहिसबंधो त्ति । किं कारणमेत्येवुक्कस्ससामित्त जादमिदि चे सम्मत्तस्स तदवत्थाए मिच्छत्तगुणणिवधणमधापवत्तसकमपजाएण सबुक्कस्सएण परिणमणदसणादो । जयध० २ कुदो एवं चे वधसबधाभावे वि सहावटो चेव सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताण मिच्छाइटिठम्मि अतो. मुद्दत्तमेत्तकालमधापवत्तसकमपयुत्तीए संभवम्भुवगमादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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