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________________ प्रस्तविना चूँकि षट्खडागमके प्रथम खंड जीवट्ठाणमें उक्त आठों प्ररूपणाओं या अनुयोगद्वारोका विस्तृत विवेचन किया जा चुका था, अतएव उन्होंने अपनी रचनामें उनपर कुछ लिखना निरर्थक या अनावश्यक समझा । इसी प्रकार षटखंडागमके छठे खड महाबन्धमें बन्धके चारो प्रकारोंका चौबीस अनुयोगद्वारोसे अति विस्तृत विवेचन उपलब्ध होनेसे उन्होंने प्रस्तुत ग्रन्थके चौथे अर्थाधिकारमें बन्धका कुछ भी वर्णन न करके लिख दिया कि वह चारों प्रकारका बन्ध बहुशः प्ररूपित है , अतएव हम उस पर कुछ भी नहीं लिख रहे हैं। चूर्णिकार-द्वारा प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश विभक्तियोंके स्वामित्व आदि अनुयोगद्वारोंके वर्णन षट्खंडागमके बन्धस्वामित्वनामक दूसरे और वेदना नामक चौथे खडके आभारी हैं, यह दोनोंके तुलनात्मक अध्ययनसे स्पष्ट ज्ञात हो जाता है । उदाहरणके रूपमें यहाँ दोनो ग्रन्थोका एक-एक उद्धरण दिया जाता है। कसायपाहुड-चूर्णि __षखंडागम-सूत्र सुहुमणिगोदेसु कम्मट्ठिदिमच्छि- जो जीवो सुहुमणिगोद-जीवेसु पदाउो । तत्थ सव्यवहुआणि अपजत्त- लिदोवमस्स असंखेज्जदिभागेण ऊणियं भवग्गहणाणि दीहाओ अपजत्तद्धाओ कम्मट्ठिदिमच्छिदो। तत्थ य संसरमाणस्स तप्पाप्रोग्ग-जहएणयाणि जोगट्ठाणाणि | बहुआ अपज्जत्तभवा, थोवा पज्जत्तभवा। अभिक्खं गदो । तदो तप्पाओग्गजह- | दीहाओ अपज्जत्तद्धाो रहस्सायो पजएिणयाए वड्ढीए वड्ढिदो । जदा जदा | त्तद्धाो । जदा जदा आउअं बंधदि, तदा आउअं बंधदि, तदा तदा तप्पाओग्गउक- । तदा तप्पाओग्गुक्कस्सएण जोगेण बंधदि । स्सएसु जोगट्ठाणेसु बंधदि । हेडिल्लीणं उवरिल्लीण द्विदीणं णिसेयस्स जहएणपदे द्विदीणं णिसेयस्स उक्कस्सपदेसं तप्पाप्रोग्गं | हेछिल्लीणं ट्टिदीण णिसेयस्स उक्कस्सपदे उक्कस्सविसोहिमभिक्खं गदो, जाये अभव- बहुसो बहुसो जहएणाणि जोगट्ठाणाणि सिद्धियपाओग्गं जहण्णगं कम्मं कदं गच्छदि। बहुसो बहुसो मंदसंकिलेसपरितदो तसेसु आगदो संजमासंजमं संजमं | णामो भवदि । xxxएवं णाणाभवसम्मत्तं च बहुसो लद्धो । चत्तारि वारे गहणेहि अट्ठसंजमकंडयाणि अणुपालकसाए उवसामित्ता तदो वे छावद्विसाग- | इत्ता चदुक्खुत्तो कसाए उवसामइत्ता पलिरोवमाणि सम्मत्तमणुपालेदूण नदो दंसण- दोवमस्सासखेज्जदिभागमेत्ताणि संजमामोहणीयं खवेदि । अपच्छिम-द्विदिखंडय- | संजमकंडयाणि सम्मत्तकंडयाणि च अणुमवणिज्जमाणयमवणिदमुदयावलियाए जं पालइत्ता xxx खवणाए अब्भुट्ठिदो तं गलमाण तं गलिदं, जाधे एकिस्से द्वि- चरिमसमयछदुमत्थो जादो । तस्स चरिमदीए दुसमयकालहिदिग सेस ताधे मिच्छ- समयछदुमत्थस्स णाणावरणीयवेदणा तस्स जहएणयं पदेससंतकम्म। दव्वदो जहएणा। (प्रदेशवि० सू० २१) (वेदणाखंड, वेयणदव्वविहाण) * देखो पृ० २४६ ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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