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________________ ३९० कसाय पाहुड सुत्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार ४९३. अण्णयरस्स । ४९४ सम्मत्त सम्मामिच्छत्ताणमणंतगुणहाणिसंकमो कस्स ? ४९५. दंसणमोहणीयं खवेंतस्सं । ४९६. अवद्वाणसंकमो कस्स १४९७. अण्णदरस्तं । ४९८. अवत्तव्वसंकमो कस्स १ ४९९ विदियसमय उवसमसम्माइट्ठिस्स । ५००. सेसाणं कम्माणं मिच्छत्तभंगो । ५०१ णवरि अनंताणुबंधीणमवत्तव्यं विसंजोएदूण पुणो मिच्छत्तं गंतूण आचलियादीदस्स । ५०२. सेसाणं कम्माणमवत्तव्यमुवसामेदूण परिवमाणयस्स | ५०३. अप्पा बहुअं । ५०४ सव्वत्थोवा मिच्छत्तस्स अनंतभागहाणिसंकामया " । ५०५. असंखेज्जभागहाणिसंकामया असंखेज्जगुणा । ५०६. संखेज्जभागहाणि संकामया समाधान- किसी एक सम्यग्दृष्टि या मिथ्यादृष्टिके होता है ||४९३ ॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका अनन्तगुणहानिसंक्रमण किसके होता है ? ||४९४ ॥ समाधान- दर्शनमोहनीय कर्मका क्षपण करनेवाले जीवके होता है ||४९५|| शंका-उक्त दोनो कर्मोंका अवस्थानसंक्रमण किसके होता है ? ॥४९६॥ समाधान - किसी एक सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टिके होता है || ४९७ ॥ शंका- उक्त दोनो कर्मोंका अवक्तव्यसंक्रमण किसके होता है ? ॥ ४९८ ॥ समाधान- द्वितीयसमयवर्ती उपशमसम्यग्दृष्टिके होता है ॥ ४९९ ॥ चूर्णिसू० - शेप कर्मोंका स्वामित्व मिथ्यात्व के समान जानना चाहिए । विशेषता केवल यह है कि अनन्तानुबन्धी कपायोका अवक्तव्य संक्रमण अनन्तानुबन्धीका विसंयोजन करके पुनः मिथ्यात्वको प्राप्त होकर एक आवलीकाल व्यतीत करनेवाले मिध्यादृष्टि जीवके होता है । शेष कर्मोंका अवक्तव्य संक्रमण कपायोका उपामन करके नीचे गिरनेवाले जीवके होता है ॥५००-५०२॥ चूर्णिम् ० (० - अव वृद्धि आदि पदोका अल्पबहुत्व कहते है - मिध्यात्वकी अनन्तभागहानिके संक्रामक वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम है । अनन्तभागवृद्धि-संक्रामको से असंख्यात भागहानिके संक्रामक असंख्यातगुणित हैं। असंख्यात भागहानि - संक्रामको से संख्यातभागहानिके संक्रामक संख्यातगुणित हैं । संख्यात भागहानि - संक्रामकोसे संख्यातगुणहानिके भावादो | ण च बधेण विणा अणुभागसंकमस्स वड्ढी लम्भदे, तहाणुवलद्धीदो । तहा पचविद्दा हाणी वि तत्थ त्थि, सुविमदविसोहीए कडयघाद करेमाणसम्माइट्ठिम्मि अणतगुणहाणि मोत्तूण सेसपचहाणीणमसंभवादो । तदो मिच्छाइट्रिट्ठस्सेव णिरुद्धछवड्ढि - पचहाणीण सामित्तमिदि । जयध० १ कुदो; दसणमोहक्खवणादो अण्णत्ये देसिमनुभागघादासभवादो । जयध० २ कुदो, मिच्छाइट्ठि सम्माइट्ठीर्ण तदुवलद्वीए विरोहाभावादो । जयध० ३ कुदो, तत्थासक्रमादो सकमपवृत्तीए परिप्फुडमुवलभादो | जयध० ४ कुदो, एगकडयविसयत्तादो | जयध० ५ चरिमुव्वकट ठाणा दोपहुढि अणतभागहाणि अद्वाणमेगकडयमेत्त चेव होदि । एदेसि पुण तारसाणि अद्वाणाणि ख्वाहियक डयमेत्ताणि हवति । तदो तव्विसयादो पयदविसयो असखेजगुणो त्ति सिद्धमेदेसिं तत्तो असखेजगुणत्त । जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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