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________________ __३८९ गा० ५८] अनुभागसंक्रम-वृद्धि-स्वामित्व-निरूपण बड्डी अणंतगुणा' । ४८१. अट्ठणोकसायाणं जहणिया हाणी अवठ्ठाणसंकमो च तुल्लो थोवो ४८२. जहणिया वड्डी अणंतगुणा । पदणिक्खेवो समत्तो ४८३. वड्डीए तिण्णि अणिओगद्दाराणि समुक्त्तिणा सामित्तमप्पाबहुअं च । ४८४. समुकित्तणा । ४८५. मिच्छत्तस्स अस्थि छबिहा वड्डी, छबिहा हाणी अवट्ठाणं च । ४८६. सम्मत्त-सम्मामिच्छताणमस्थि अणंतगुणहाणी अवठ्ठाणमवत्तव्ययं च । ४८७. अणंताणुबंधीणमत्थि छव्हिा वड्डी हाणी अवट्ठाणमवत्तव्वयं च । ४८८. एवं सेसाणं कम्माणं । ४८९. सामित्तं । ४९०. मिच्छत्तस्स छव्हिा वड्डी पंचविहा हाणी कस्स ? ४९१. मिच्छाइडिस्स अण्णयरस्स। ४९२. अणंतगुणहाणी अवट्ठिदसंकमो च कस्स ? कर्मोंका जघन्य अवस्थान अनन्तगुणित है। इससे उन्हीकी जघन्य वृद्धि अनन्तगुणित होती है। आठो मध्यम कपायोकी जघन्य हानि और अवस्थानसंक्रमण परस्पर तुल्य और अल्प है । जघन्य वृद्धि अनन्तगुणित है ॥४७०-४८२॥ इस प्रकार पक्षनिक्षेप अधिकार समाप्त हुआ । चूर्णिसू०-वृद्धि अधिकारमे तीन अनुयोगद्वार हैं-समुत्कीर्तना, स्वामित्व और अल्पबहुत्व । पहले समुत्कीर्तना कहते है-मिथ्यात्वकी छह प्रकारकी वृद्धि, छह प्रकारकी हानि और अवस्थान होता है। सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वकी अनन्तगुणहानि होती है, अवस्थान और अवक्तव्यसंक्रमण होता है । अनन्तानुवन्धी कषायोकी छह प्रकारकी वृद्धि और छह प्रकारकी हानि होती है, तथा अवस्थान और अवक्तव्यसंक्रमण भी होता है। इसी प्रकार शेप बारह कपाय और नव नोकपायोकी वृद्धि, हानि, अवस्थान और अवक्तव्यसंक्रमण होते हैं ॥४८३-४८८॥ . चूर्णिसू०-अब वृद्धि आदिके स्वामित्वको कहते हैं ॥४८९॥ . शंका-मिथ्यात्वकी छह प्रकारकी वृद्धि और अनन्तगुणहानिको छोड़कर पॉच प्रकारकी हानि किसके होती है ? ॥४९०॥ समाधान-किसी एक मिथ्यादृष्टिके होती है ॥४९१॥ शंका-मिथ्यात्वकी अनन्तगुणहानि और अवस्थितसंक्रमण किसके होता है ? ॥४९२।। १ कुदो, एत्तो अणतगुणसुहुमाणुभागविसए लद्धजण्णभावत्तादो । जयध० २ कुदो, दोण्हमेदेसिं पदाणमप्पप्पणो चरिमाणुभागखडयविसए पयदजहण्णसामित्तसमुवलद्धीदो। जयध० ३ दसणमोहक्खवणाए अणतगुणहाणिसभवो, हाणीदो अण्णस्थ सव्वत्थेवाठाणसकमसभवो, असकमादो सकामयत्तमुवगयम्मि अवत्तव्वस कमो, तिण्हमेदेसिमेत्य सभवो ण विरुज्झदे । सेसपदाणमेत्थ णस्थि सभवो । जयध० ४ णवरि सवोवसामणापडिवादे अवत्तव्वसभवो वत्तव्यो । जयध० ५ (कुदो;) ण ताव सम्माइट्ठिम्मि मिच्छत्ताणुभागविसयछवढीणमत्यि सभवो, तत्थ तबधा
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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