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________________ ૨૭૮ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार सादिरेयं । ३४६. अप्पयरसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होइ १ ३४७. जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । ३४८. उक्कस्सेण तेवद्विसागरोवमसदं सादिरेयं । ३४९. अवद्विदसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होइ ? ३५०, जहणणेण एयसमओ । ३५१. उकस्सेण अंतोमुहुत्त । ३५२. सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमप्पयरसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होइ ? ३५३. जहण्णुकस्सेण अंतोमुहुत्तं । ३५४. अवद्विदसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होइ ? ३५५. जहण्णेण एयसमओ । ३५६. उक्कस्सेण उवड्डपोग्गलपरियट्ट । शंका-मिथ्यात्वके अल्पतर-संक्रमणका अन्तरकाल कितना है ? ।। ३४६।। समाधान-जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तरकाल सातिरेक एक सौ तिरेसठ सागरोपम है ॥३४७-३४८॥ शंका-मिथ्यात्वके अवस्थित-संक्रमणका अन्तरकाल कितना है ? ॥३४९॥ समाधान-जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है ॥३५०-३५१॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके अल्पतर-संक्रमणका अन्तरकाल कितना है ? ॥३५२॥ समाधान-जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है ।।३५३।। शंका-उक्त दोनों कर्मोंके अवस्थित-संक्रमणका अन्तरकाल कितना है ? ॥३५४॥ समाधान-जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल उपाधपुद्गलपरिवर्तन है ।।३५५-३५६॥ १ तं जहा-भुजगारसकामओ अवट्टिदभावमुवणमिय तिरिक्ख-मणुसेसु अंतीमुहुत्तमेत्तकाल गमिऊण तिपलिदोवमिएसुववण्णो। सगढिदिमणुपालिय थोवावसेसे जीविदवए त्ति उसमसम्मत्त घेत्तूण तदा वेदगसम्मत्त पडिवजिय पढम-विदियछावट्ठीओ परिभमिय तदवसाणे समयाविरोहेण मिच्छत्तमुवणमिय एकत्तीससागरोवमिएसु देवेसुववण्णो। तत्तो चुदो मणुसेसुप्पनिय अतोमुहुत्तेण सकिलेस पूरिय भुजगारः संकामओ जादो। तत्थ लद्ध मेदमुक्कस्सतर वे अतोमुहुत्ताहिय-तिपलिदोवमेहि सादिरेयतेवठिसागरोवमसदमेत्त | जयध० २ तं कथ ? गसणमोहक्खवणाए मिच्छत्तस्स तिचरिमाणुभागखडयचरिमफालिं पादिय तदणतर मप्पयरसकर्म कादूर्णतरिय पुणो दुचरिमाणुभागखडय घादिय अप्पयरभावमुवगयम्मि लद्धमतर होइ । जयघ° ३ कुदो; अवठ्ठिदसकमकालस्स पहाणभावेणेत्थ वित्रक्खियत्तादो । जयध० ४ भुजगारेणप्पयरेण वा एयसमयमतरिदस्स तदुवलभादो | जयध० ५ कुदो भुजगारुक्कस्सकालेणतरिदस्स तदुवलद्धीदो । जयध० ६ तत्थ जहण्णतरे विवक्खिए सम्मत्तस्स चरिमाणुमागखडयकालो घेत्तव्यो। सम्मामिच्छत्तस्स तिचरिमाणुमागखडयपदणाणतरमप्पदरं कादूर्णतरिय दुचरिमाणुभागखडए पादिटे लममतर कायव । दोण्हमुक्कस्सतरे इच्छिजमाणे पढमाणुभागखंडयदाघाण तरमप्पयर कादूणतरिय विदियाणुभागखडए णिट्ठिद लद्धमंतरं कायव । जयध ७ अप्पयरसकमेणेयसमयम तरिदस्स तदुवलद्धीदो | जयध० ८ पढमसम्मत्तमुप्पाइय मिच्छत्त गण सबलहु उच्वेलणचरिमफालिं पादिय अतरिदस्त पुणो उवढपोग्गलपरियडावसाणे सम्मत्त प्पारणतदियसमयम्मि पयदंतरसमाणणोवलद्धीदो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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