SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 462
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३५४ कसाय. पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार वेदक्खवओ तरसेव चरिमे अणुभागखंडए वट्टमाणओ। ६६. छण्णोकसायाणं जहण्णाणुभागसंकामओ को होइ ? ६७. खवगो तेसिं चेव छण्णोकसायवेदणीयाणं चरिमे अणुभागखंडए वट्टमाणओ। ६८. एयजीवेण कालो । ६९. मिच्छत्तस्स उकस्साणुभागसंकामओ केवचिरं कालादो होदि ? ७०. जहण्णुक्कस्सेण अंतोमुहत्तं । ७१. अणुक्कस्साणुभागसंकामओ केवचिरं कालादो होदि ? ७२. जहण्णेण अंतोमुहुत्त । ७३. उक्कस्सेण अणंतकाल. मसंखेजा पोग्गलपरियट्टा । ७४. एवं सोलसकसाय-णवणोकसायाणं । ७५. सम्मत्तसम्मामिच्छत्ताणमुक्कस्साणुभागसंकामओ केवचिरं कालादो होदि ? ७६. जहण्णेण समाधान-नपुंसकवेदका क्षपण करनेवाला नपुंसक्वेदके ही अन्तिम अनुभागखंडमें वर्तमान जीव नपुंसकवेदके जघन्य अनुभागका संक्रामक है ।।६५॥ शंका-हास्यादि छह नोकषायोके जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन है ? ॥६६॥ समाधान-उन्हीं हास्यादि छह नोकषायवेदनीयोंके अन्तिम अनुभागखंडमे वर्तमान क्षपक जीव छह नोकपायोंके जघन्य अनुभागका संक्रामक है ॥६७॥ चूर्णिसू०-अव एक जीवकी अपेक्षा मिथ्यात्वादिकर्मों के उत्कृष्ट अनुभाग संक्रमणका काल कहते है ॥६८॥ शंका-मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभाग संक्रमणका कितना काल है १ ॥६९।। समाधान-मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमणका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है ॥७॥ शंका-मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट अनुभागसंक्रमणका कितना काल है ? ॥७१॥ समाधान-मिथ्यात्वके अनुकृष्ट अनुभागसंक्रमणका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट काल असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन है ।।७२-७३।। चूर्णिसू०-इसी प्रकार सोलह कषाय और नव नोकपायोके अनुभागसंक्रमणका काल जानना चाहिए ॥७४॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिध्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमणका कितना काल है ? ॥७५॥ १ जहण्णेण ताव उक्कस्साणुभाग बधिदूणावलियादीद सकामेमाणएण सव्वलहुमणुभागखडए धादिदे अतोमुहुत्तमेत्तो उक्करसाणुभागसकामयजहण्णकालो लदो होइ ! एत्तो सखेजगुणो उकस्सकालो होइ; उकस्साणुभाग बधिऊण खडयघादेण विणा सुछ बहुअ कालमच्छ तस्स वि अतोमुहुत्तादो उवरिमवठाणासभवादो। जयध० २ उक्कस्सागुभागसकमादो खडयघादवलेणाणुकत्समकामयत्तमुवण मय पुणो वि सव्वरहस्सेण कालेण उफरसाणुभागसकामयत्तमुवगयम्मि तदुवलभादो । जयध० ३ उक्कत्साणुभागसंकमादो खडयघादवसेणाणुकस्सभावमुवगयस्स एइदिय-वियलि दिएसु उकत्साणुभागबंधविरहिएसु असंखेजपोग्गलपरियट्टमेत्तकालमणुकसभावावहाणदसणादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy