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________________ गा० ५८] अनुभागसंक्रम-स्वामित्व-निरूपण ३५३ संछुहमाणओ । ५५. अणंताणुबंधीणं जहण्णाणुभागसंकामओ को होइ १ ५६. विसंजोएदूण पुणो तप्पाओग्गविसुद्धपरिणामेण संजोएदणावलियादीदो' । ५७. कोहसंजलणस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होइ ? ५८. चरिमाणुभागबंधस्स चरिमसमयअणिल्लेवणो। ५९. एवं माण-मायासंजलण-पुरिसवेदाणं। ६०. लोहसंजलणस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होइ ? ६१. समयाहियावलियचरिमसमयसकसाओ खवगो । ६२. इत्थिवेदस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होइ ? ६३. इत्थिवेदक्खवगो तस्सेव चरिमाणुभागखंडए वट्टमाणओ । ६४. ण,सयवेदस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होइ ? ६५. णवंसय शंका-अनन्तानुवन्धी चारो कषायोके जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन है ? ॥५५॥ समाधान अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना करके पुनः तत्प्रायोग्य विशुद्ध परिणामके द्वारा उसे संयोजित करके अर्थात् पुनः नवीन बंध करके एक आवलीकाल व्यतीत करनेवाला जीव अनन्तानुवन्धी कषायोके जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है ॥५६॥ शंका-संज्वलनक्रोधके जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन है ? ॥५७॥ समाधान-क्रोधवेदक क्षपकका जो अन्तिम अनुभागवन्ध है, उसके अन्तिम समयका अनिर्लेपक जो जीव है, अर्थात् मानवेदककालके दो समय कम दो आवलियोके अन्तिम समयमें वर्तमान जो जीव है, वह संज्वलनक्रोधके जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है ॥५८॥ चूर्णिसू०-इसी प्रकार संज्वलनमान, संज्वलनमाया और पुरुषवेदके जघन्य अनुभागसंक्रमणका स्वामित्व जानना चाहिए ।।५९।। शंका-संज्वलनलोभका जघन्य अनुभागसंक्रामक कौन है ? ॥६०॥ समाधान-एक समय अधिक आवलीके अन्तिम समयमे वर्तमान सकषाय क्षपक अर्थात् सूक्ष्मसाम्परायसंयत संज्वलनलोभके जघन्य अनुभागका संक्रामक है ।।६१॥ शंका-स्त्रीवेदके जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन है ? ॥६२॥ समाधान-स्त्रीवेदका क्षपण करनेवाला स्त्रीवेदके ही अन्तिम अनुभागखंडमे वर्तमान जीव स्त्रीवेदके जघन्य अनुभागका संक्रामक है ।।६३॥ शंका-नपुंसकवेदके जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन है ? ॥६४॥ १ किमट्ठमेसो विसजोयणाए पुणो जोयणाए पयहाविदो ? विट्ठाणाणुभागसंतकम्म सव्व गालिय णवकबधाणुभागे जहण्णसामित्तविहाणछ । तत्थ वि असखेबलोगमेत्तपडिवादहाणेसु तप्पाओग्गजहष्णसकिलेसाणुविद्धपरिणामेण सजुत्तो त्ति जाणावण? तप्पाओग्गविसुद्धपरिणामेणेत्ति भणिद, मदसकिलेसिदाए चेव विसोहितेण विवक्खियत्तादो। २ कोहवेदयस्स खवयस्स जो अपच्छिमो अणुभागवधो सो चरिमाणुभागबधो णाम | सो वुण किट्टिसरूवो; कोहतदियकिट्टीवेदएण णिव्वत्तिदत्तादो । तस्स चरिमाणुभागवधस्स चरिमसमयअणिल्लेवगो त्ति भणिदे माणवेदगडाए दुसमयूणदोआवलियाण चरिमसमए वमाणओ घेत्तव्यो । जयध ३ कुदो एत्थ जण्णभावो ? ण, सुहुमकिट्टीए अणुसमयमणतगुणहाणिसरूवेण अतोमुहुत्तमेत्तकालमोवहिदाए तत्थ सुठ्ठ जण्णभावेण सकमुवलभादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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