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________________ ३४६ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार ४. ओकड्डणाए परूवणा । ५. पडमफद्दयं ण ओकड्डिजदि । ६. विदियफद्दयं ण ओकड्डिज्जदि। ७ एवमणंताणि फद्दयाणि जहणिया अइच्छावणा, तत्तियाणि फद्दयाणि ण ओकड्डिज्जंति । ८. अण्णाणि अणंताणि फद्दयाणि जहण्णणिक्खेवमेत्ताणि च ण ओकड्डिज्जंति । ९. जहण्णओ णिक्खेवो जहणिया अइच्छावणा च तत्तियमेत्ताणि फद्दयाणि आदीदो अधिच्छिदण तदित्थफद्दयमोकड्डिज्जई । १०. तेण परं सव्वाणि फद्दयाणि ओकड्डिजति । ११. एत्थ अप्पाबहुअं । १२. सव्वत्थोवाणि पदेसगुणहाणिहाणंतरफद्दयाणि । चूर्णिसू०-इनमेंसे पहले अपकर्पणा या अपवर्तनारूप संक्रमणकी प्ररूपणा की जाती है-प्रथम स्पर्धक अपकर्पित नहीं किया जा सकता । द्वितीय स्पर्धक अपकर्पित नहीं किया जा सकता । इस प्रकार अनन्त स्पर्धक अपकर्षित नहीं किये जा सकते, जिनका कि प्रमाण जघन्य अतिस्थापना जितना है। इसी प्रकार इनसे आगेके जघन्य निक्षेपमात्र अन्य अनन्त स्पर्धक भी अपकर्पित नहीं किये जा सकते । आदि स्पर्धकसे लेकर जघन्य निक्षेप और जघन्य अतिस्थापनाका जितना प्रमाण है, उतने स्पर्धक अतिक्रान्त करके जो इष्ट स्पर्धक प्राप्त होता है, वह अपकर्पित किया जा सकता है और उससे परवर्ती सर्व स्पर्धक अपकर्पित किये जा सकते हैं ॥४-१०॥ विशेषार्थ-ऊपरके स्पर्धकोके अनुभागका अपकर्षण करके नीचे जिन स्पर्धकोमे उसे निक्षिप्त किया जाता है, उन्हे निक्षेप कहते हैं, और आदि स्पर्धकसे लेकर निक्षेपके प्रथम स्पर्धकके पूर्वतकके जिन स्पर्धकोके वह अपकर्पित अनुभागशक्ति निक्षिप्त नहीं की जाती और न जिनका अपकर्पण ही किया जा सकता है, उन्हे अतिस्थापना कहते हैं । चूर्णिसू०-यहॉपर जघन्यनिक्षेपादिविपयक अल्पवहुत्व इस प्रकार है-प्रदेशगुण१ कुदो; तत्थाइच्छावणाणिक्खेवाणमदसणादो । जयध० २ तत्थ वि अइच्छावणाणिक्खेवाभावस्स समाणत्तादो । जयध० ३ तस्साइच्छावणासभवे वि णिस्खेवविसयादसणादो। जयध० ४ अइच्छावणाणिक्खेवाणमेत्य सपुण्णत्तदसणादो। विवक्खियफद्दयादो हेट्ठा जहण्णा इच्छावणामेत्तमुल्लघिय हेलिमेसु फद्दएसु जहण्णणिक्खेवमेत्तेसु जहण्णफद्दय रज्जवसाणेसु तदित्थफद्दयोकड्डणासभवो त्ति भणिद होइ । जयध० ५ पदेसगुणहाणिठाणतर णाम किं ? जम्मि उद्देसे पहमफद्दयादिवग्गणा अवदिविसेसहाणीए गच्छमाणाए दुगुणहीणा जायदे, तदवहिपरिच्छिण्णमद्धाण गुणहाणिठाणतरमिदि भण्णदे । एदम्मि पदेसगुणहाणिठाणंतरे अणंताणि फद्दयाणि अभवसिद्धिएहितो अण तगुणमेत्ताणि अस्थि, ताणि सव्वत्थोवाणि त्ति भणिद होइ । जयध० ६ थोवं पएसगुणहाणिअंतरं दुसु जहन्ननिक्खेवो । कमसो अणतगुणिओ दुसु वि अइत्थावणा तुल्ला ॥८॥ वाघाएणणुभागकंडगमेकाइ वग्गणाऊणं । उकस्सो णिक्खेवो ससंतबंधो य सविसेसो ॥९॥ कम्मप० उद्वर्तनापवर्त०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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